*श्रद्धा दूरियों को मिटा देती है, धैर्य से खिल उठते हैं भक्ति के कमल : निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज*
कुण्डलपुर(म.प्र.)।
जैन दर्शन में निमित्त और उपादान का सिद्धांत जीवन को समझने की महत्वपूर्ण दृष्टि प्रदान करता है। प्रत्येक कार्य अपने उपादान से होता है, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति में निमित्त की सहयोगी भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। मनुष्य को अपने कर्तव्य करते रहना चाहिए, लेकिन कर्तृत्व का अहंकार नहीं पालना चाहिए। भौतिक दूरी होने पर भी श्रद्धा, स्मरण और अपनत्व के माध्यम से गुरु एवं आराध्य के सान्निध्य का अनुभव किया जा सकता है। यह विचार निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में व्यक्त किए।
प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री ने निमित्त और उपादान के संबंध को स्पष्ट करते हुए कहा कि हमारे जीवन में जो भी परिणाम होते हैं, उनमें उपादान कारण तो होता ही है, लेकिन उन परिणामों को प्रभावित करने में निमित्त भी सहयोगी बनता है। कार्य उपादान में ही होता है, परंतु उसकी जागृति और अभिव्यक्ति में निमित्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कई बार बड़ा निमित्त मिलने पर भी उपादान की योग्यता और जागृति नहीं होने से अपेक्षित कार्य नहीं हो पाता। इसलिए निमित्त और उपादान के बीच विरोध नहीं, बल्कि मैत्री का संबंध समझना चाहिए।
उदाहरण देते हुए महाराज श्री ने कहा कि घड़ा मिट्टी से ही बनेगा, लेकिन मिट्टी अपने आप घड़े का रूप धारण नहीं कर लेती। इसके लिए कुम्हार का सहयोग आवश्यक है। इसी प्रकार रोटी का उपादान आटा है, लेकिन उसे गूंथने, बेलने और सेंकने की प्रक्रिया के बिना रोटी नहीं बन सकती। यदि निमित्त यह अहंकार करे कि उसके बिना रोटी नहीं बन सकती, तो वह आटे के बिना रोटी बनाकर दिखाए। वास्तविकता यह है कि उपादान और निमित्त दोनों की अपनी-अपनी भूमिका है।


उन्होंने कहा कि संसार में बंधने का कारण भी हमारे अपने परिणाम हैं और संसार से मुक्त होने की दिशा में बढ़ने का आधार भी हमारे परिणाम ही हैं। हालांकि इन परिणामों को प्रभावित करने वाले निमित्त भी होते हैं। मुनि बनना, निर्ग्रंथ मुद्रा धारण करना और रत्नत्रय के उत्कृष्ट भावों की अभिव्यक्ति बाहरी निमित्तों से जुड़ी है, लेकिन केवल मुनि मुद्रा धारण कर लेने से उत्कृष्ट परिणाम स्वतः उत्पन्न हो जाएं, यह आवश्यक नहीं है। बाहरी निमित्त और आंतरिक परिणामों के बीच समन्वय को समझना जरूरी है।


धर्मास्तिकाय का उदाहरण देते हुए मुनि श्री ने बताया कि कर्मों से मुक्त होने के बाद आत्मा में ऊर्ध्वगमन का स्वभाव प्रकट होता है। फिर भी सिद्ध आत्मा लोक के अंत तक पहुंचकर वहीं ठहर जाती है, क्योंकि लोक के बाहर धर्मास्तिकाय का अभाव है। धर्मास्तिकाय जीव के गमन में सहायक निमित्त है। इससे स्पष्ट होता है कि स्वभाव की अभिव्यक्ति में भी अनुकूल निमित्त की भूमिका होती है।
नदी के दोनों किनारों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि दोनों किनारे एक-दूसरे से दूर होते हुए भी नदी के प्रवाह में सहयोगी होते हैं। इसी प्रकार निमित्त और उपादान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि अपनी-अपनी भूमिका में सहयोगी हैं। इस सिद्धांत को समझने का उद्देश्य यही है कि कोई किसी पर अनावश्यक आरोप न लगाए और न ही अपने कर्तृत्व का अहंकार करे। जहां कर्तृत्व का अहंकार आता है, वहीं से व्यक्ति के पतन की शुरुआत होती है। इसलिए कर्तव्य करते रहें, लेकिन कर्तापन और स्वामित्व का भाव न आने दें।
धैर्य और विश्वास से खिलते हैं भक्ति के कमल
महाराज श्री ने श्रद्धा और धैर्य को समझाने के लिए सुंदर पंक्तियां प्रस्तुत कीं—“सूरज दूरज हो भले, भरी गगन में धूल, पर सर में नीरज खिले, धीरज हो भरपूर।” उन्होंने कहा कि सूर्य बहुत दूर है और आकाश में धूल भी छाई हुई है, फिर भी सरोवर में कमल खिलते हैं। सूर्य की किरणें जब कमलों तक पहुंचती हैं, तो वे खिल उठते हैं। इससे सीख मिलती है कि परिस्थितियां प्रतिकूल हों और लक्ष्य दूर दिखाई दे, तब भी धैर्य नहीं खोना चाहिए। धैर्य और विश्वास के साथ प्रयास जारी रखने पर जीवन में सकारात्मक परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।


गुरु-स्मरण से इस भाव को जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि गुरुवर भले ही प्रत्यक्ष रूप से हमारे सामने नहीं हैं, लेकिन उनकी शिक्षा, आदर्श और वाणी जीवन में प्रेरणा देते रहते हैं। चौबीस तीर्थंकर सिद्धालय में विराजमान हैं। वे हमारे बुलाने से भौतिक रूप से वापस नहीं आते, फिर भी पूजन में आह्वान और स्थापना का भाव किया जाता है। इसका आशय भगवान को शरीर सहित बुलाना नहीं, बल्कि श्रद्धा के माध्यम से अपने भावों में उनकी उपस्थिति अनुभव करना है।
मुनि श्री ने कहा कि भक्त भगवान को केवल बाहरी आसन पर विराजमान करने की भावना नहीं करता, बल्कि अपने हृदय के सिंहासन पर प्रतिष्ठित करना चाहता है। पूजन की सार्थकता इसी आंतरिक भाव में है। श्रद्धेय और श्रद्धालु के बीच भौतिक दूरी हो सकती है, लेकिन सच्ची श्रद्धा उस दूरी को भावनात्मक रूप से मिटा देती है। उन्होंने कहा, “श्रद्धा करे दूर सब दूरी, रही न भक्ति कभी अधूरी।”

माता-पिता और बच्चों के संबंध का उदाहरण देते हुए महाराज श्री ने कहा कि बच्चे कहीं हों और माता-पिता कहीं, तब भी उनके बीच प्रेम और अपनत्व बना रहता है। कभी माता-पिता को बेटे-बहू की याद आती है और वे फोन करने का विचार करते हैं, तभी दूसरी ओर से फोन की घंटी बज उठती है। फोन उठाते ही कहा जाता है कि हम भी अभी आपको याद करके फोन लगाने वाले थे। ऐसे अनुभव आत्मीय संबंधों की गहराई का एहसास कराते हैं।
उन्होंने समझाया कि जैसे माता-पिता और बच्चों के बीच दूरी होने पर भी स्मरण और प्रेम का संबंध बना रहता है, वैसे ही गुरु के प्रति श्रद्धा और भक्ति का संबंध भी प्रत्यक्ष निकटता पर निर्भर नहीं है। गुरु की सीख को जीवन में उतारना, उनके आदर्शों का स्मरण करना और उनके बताए मार्ग पर चलना ही वास्तविक सान्निध्य है।
मुनि श्री के प्रवचन का सार यही है कि जीवन में निमित्तों के सहयोग को स्वीकार करें, अपने परिणामों की जिम्मेदारी समझें, कर्तव्य करते हुए अहंकार से बचें और प्रतिकूल परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखें। सच्ची श्रद्धा दूरी को बाधा नहीं बनने देती। जैसे दूर स्थित सूर्य की किरणें सरोवर के कमलों को खिलाती हैं, वैसे ही गुरु के प्रति श्रद्धा, स्मरण और अपनत्व जीवन में भक्ति तथा आत्मकल्याण के भावों को जागृत कर सकते हैं।
