सेवा ही सच्चे धर्म का स्वरूप, मानव सेवा और जीवदया से ही सार्थक होता है जीवन : अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज
सेवा ही सच्चे धर्म का स्वरूप, मानव सेवा और जीवदया से ही सार्थक होता है जीवन : अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज पूजा-पाठ के साथ हृदय में करुणा और हाथों में सेवा का भाव होना ही सच्ची धार्मिकता; जरूरतमंदों की सहायता और प्रत्येक जीव के प्रति दया ही धर्म की वास्तविक पहचान सोनकच्छ। […]
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