दशलक्षण आध्यात्मिक योग साधना एवं संस्कार शिविर में गूंजा उत्तम आर्जव धर्म का संदेश

धर्म

🌺 दशलक्षण आध्यात्मिक योग साधना एवं संस्कार शिविर में गूंजा उत्तम आर्जव धर्म का संदेश

मन, वचन और काया की सरलता ही आत्मकल्याण का मार्ग : मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज

कपट और मायाचारी छोड़ परिणामों को निर्मल बनाएं; कथनी-करनी में एकरूपता ही सच्चे आर्जव की पहचान

 

कोटा, 18 सितम्बर।

दशलक्षण महापर्व के तृतीय दिवस श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने कहा कि परिणामों की शुद्धि तथा आत्मपरिणामों में उत्तरोत्तर निर्मलता आना ही उत्तम आर्जव धर्म है। आर्जव का अर्थ है—मन, वचन और काया में सरलता तथा कथनी और करनी में एकरूपता।

 

 

मुनिश्री ने कहा कि मन में कुछ और, वचन में कुछ और तथा आचरण में कुछ और होना माया-कपट का लक्षण है। मन, वचन और काया की एकता ही वास्तविक सरलता है। मनुष्य को अपनी दृष्टि बाहरी आकर्षणों से हटाकर आत्मचिंतन और आत्मकल्याण की ओर लगानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि आत्मा का चिंतन, आत्महित और आत्मकल्याण सर्वोत्तम है; शरीर के प्रति अत्यधिक राग की चिंता उससे निम्न तथा पंचेंद्रिय विषयों की चिंता उससे भी निम्न है। पर की चिंता को इससे भी अधम बताया गया। इसलिए साधक को अपने परिणामों की ओर दृष्टि रखकर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।

वक्रता नहीं, सहजता और निर्मलता अपनाएं

मुनिश्री ने कहा कि जीवन में वक्रता, छल और प्रदर्शन नहीं, बल्कि सहजता एवं निर्मलता होनी चाहिए। घर में ममता और मंदिर में समता तक सीमित रहने के बजाय प्रत्येक परिस्थिति में आत्मचिंतन एवं समता का भाव धारण करना चाहिए। छल-कपट से चित्त को मुक्त कर निर्मल बनाना ही उत्तम आर्जव धर्म की सार्थकता है।

उन्होंने बताया कि मनोगुप्ति, ब्रह्मचर्य, आत्मचिंतन तथा मन-वचन-काय की एकता आत्मसंयम की उच्च साधना से जुड़े गुण हैं। इन गुणों को जीवन में उतारना ही धर्म का वास्तविक उद्देश्य है। उत्तम आर्जव केवल बाहरी व्यवहार की सरलता नहीं, बल्कि अंतरंग परिणामों को भी सीधा, सहज और निर्मल बनाने की साधना है।

बाहरी शांति नहीं, अंतरंग निर्मलता ही सच्चा आर्जव

इससे पूर्व मुनि श्री 108 प्रणवसागर जी महाराज ने उत्तम आर्जव धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि मन की वक्रता को हटाकर ऋजुता अर्थात सरलता को धारण करना ही उत्तम आर्जव धर्म है। मन, वचन और काया को सरल बनाना तथा मायाचारी से बचना आवश्यक है।

उन्होंने बगुले का उदाहरण देते हुए कहा कि बगुला बाहर से शांत और एकाग्र दिखाई देता है, लेकिन उसके भीतर मछली पकड़ने का कपटपूर्ण भाव छिपा रहता है। इसी प्रकार केवल बाहरी शांति पर्याप्त नहीं है; अंतरंग परिणामों की निर्मलता ही सच्चे आर्जव धर्म की पहचान है।

मुनिश्री ने कहा कि मायाचारी और कपट के कारण जीव संसार की विभिन्न गतियों में भटकता रहता है। धर्म के लिए धन की नहीं, बल्कि सरल, सहज और शुद्ध भावों की आवश्यकता है। कपट का त्याग कर मन को निर्मल बनाना ही उत्तम आर्जव धर्म का मूल संदेश है।

नवनिर्वाचित पार्षद का स्वागत-अभिनंदन

शिविर निदेशक श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि इस अवसर पर वार्ड नंबर 86 से नवनिर्वाचित पार्षद श्री अर्पित जैन हरसोरा एवं उनके परिवारजनों का स्वागत एवं अभिनंदन किया गया।

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🌼 शिविरार्थियों ने साधना, संयम और धार्मिक अनुशासन के साथ मनाया उत्तम आर्जव धर्म

उपवास सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता; शांतिधारा, दशलक्षण विधान, भक्तामर विधान एवं तत्त्वार्थ सूत्र जिज्ञासा-समाधान में लिया भाग

दशलक्षण आध्यात्मिक योग साधना एवं संस्कार शिविर में अनेक शिविरार्थियों ने उपवास सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भक्तिभाव से सहभागिता की। शिविरार्थियों ने शांतिधारा, दशलक्षण विधान, भक्तामर विधान, तत्त्वार्थ सूत्र एवं जिज्ञासा-समाधान सहित विविध धार्मिक गतिविधियों में सहभागिता की।

शिविर के दौरान शिविरार्थियों ने एक समय शुद्ध भोजन ग्रहण करते हुए धार्मिक अनुशासन का पालन किया। दिनभर की धर्म-साधना के पश्चात महाआरती में भी श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर धर्मलाभ अर्जित किया।

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🌺 आज के प्रमुख पुण्यार्जक

विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक पुण्यार्जन कर अर्जित किया धर्मलाभ

प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्रीमती गौरा बाई, श्री मनोज जी, अनीता जी एवं आदित्य जी सहित समस्त परिवार द्वारा आदित्य जी के जन्मदिन के शुभ अवसर पर श्रद्धापूर्वक किया गया।

श्री सुमित सेंकी ने बताया कि महाआरती एवं श्रावक श्रेष्ठी का पुण्यार्जन सुशीला, विवेक ठोरा परिवार द्वारा किया गया।

श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमती कमला देवी, सुनील, संतोष छाबड़ा परिवार; राजेश, सोनल एवं ओमांशी सेठिया परिवार; सुशीला एवं विवेक ठोरा परिवार; धनराज एवं आशा परिवार; कैलाशचंद एवं राजेंद्र परिवार तथा राजेश घी-गुड़ वाला परिवार द्वारा किया गया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि दशलक्षण विधान में महावीर मित्तल, प्रेम कासलीवाल, संजय लुहाड़िया, डॉ. संतोष, जम्बू, रानी दुगेरिया एवं सुशीला ठोरा सहित पांच अन्य श्रद्धालुओं ने पुण्यार्जन किया। भक्तामर विधान का श्रीमती किश्कन्धा बाई जम्बू कुमार जी भानु जी भी श्रद्धापूर्वक आयोजन किया गया।

श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य गोपाल, उर्मिला जी एवं वकील साहब परिवार को प्राप्त हुआ।

श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य एक परिवार को प्राप्त हुआ।

मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

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🪷 गुरुवाणी का अमृत संदेश

आज के प्रवचन का सार

उत्तम आर्जव धर्म बाहरी सरलता से कहीं अधिक अंतर्मन की सरलता और निर्मलता का धर्म है।

मन, वचन और काया में एकरूपता हो, कथनी और करनी में अंतर न हो तथा छल-कपट एवं मायाचारी से मन को मुक्त रखा जाए—यही सच्चे आर्जव की साधना है।

अहंकार, वक्रता और कपट को छोड़कर सरलता, सहजता और आत्मचिंतन को अपनाएं। बाहरी रूप से शांत दिखाई देना पर्याप्त नहीं; अंतरंग परिणामों की निर्मलता ही आत्मकल्याण की वास्तविक दिशा है।

🌿 संदेश

“मन सरल हो, वचन मधुर हों, आचरण निर्मल हो और कथनी-करनी एक हो—यही उत्तम आर्जव धर्म का सार

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

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