श्रद्धा अंधकार में भी जीवन का मार्ग दिखाती है, गुरु की मानने वाला ही सच्चा श्रद्धालु — राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज
गुरु पूर्णिमा, सिद्धचक्र महामंडल विधान समापन, 12वें दीक्षा दिवस और चातुर्मास कलश स्थापना पर गुणायतन में उमड़ा देश-विदेश से श्रद्धालुओं का सैलाब, गुजरात के शीतल प्रसाद लादानी बने ‘चातुर्मास चक्रवर्ती’
मधुबन (श्री सम्मेदशिखरजी)।
गुरु पूर्णिमा, श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के भव्य समापन, मुनि श्री संधान सागर महाराज के 12वें दीक्षा दिवस एवं चातुर्मास कलश स्थापना महोत्सव के पावन अवसर पर गुणायतन का नव-परिसर श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हो उठा। देश के विभिन्न राज्यों तथा विदेशों से हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने इस आध्यात्मिक महोत्सव को ऐतिहासिक बना दिया।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ने बताया कि प्रातः 5 बजे मंगलाचरण के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। इसके पश्चात 55 मिनट तक वृहद शांतिधारा, पूजन एवं विविध धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। चातुर्मास कलश स्थापना में मुख्य कलश गुजरात के बकसरा निवासी श्री शीतल प्रसाद लादानी द्वारा स्थापित किया गया। उन्हें “चातुर्मास चक्रवर्ती” की उपाधि से सम्मानित किया गया। इसी अवसर पर नौ श्रद्धालुओं को “नवरत्न” के रूप में भी अलंकृत किया गया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा, “श्रद्धा वह आंतरिक विश्वास है, जो घोर अंधकार में भी जीवन का सही मार्ग दिखा देती है।” उन्होंने कहा कि केवल गुरु को मानना पर्याप्त नहीं, बल्कि गुरु की आज्ञा और आदर्शों को जीवन में उतारना ही सच्ची श्रद्धा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “गुरु को मानने और गुरु की मानने में बहुत अंतर है।”
मुनिश्री ने आध्यात्मिक उन्नति के चार प्रमुख आधार—श्रद्धा, समर्पण, साधना और सिद्धि—का उल्लेख करते हुए कहा कि श्रद्धा आधारभूमि है, समर्पण उसका बीज, साधना उसका सिंचन और सिद्धि उसका परम फल है। भगवान महावीर के प्रथम गणधर इंद्रभूति गौतम का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा और पूर्ण समर्पण ने ही उन्हें आत्मसिद्धि के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचाया।
उन्होंने कहा कि जब हृदय में गुरु के प्रति निष्कपट श्रद्धा जागृत होती है, तब गुरु का केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और भावनात्मक सान्निध्य भी प्राप्त होता है। जीवन की कठिन परिस्थितियों में श्रद्धापूर्वक गुरु का स्मरण अंतर्मन को सही मार्गदर्शन देता है और हर दुविधा का समाधान स्वतः मिलने लगता है।
समर्पण की व्याख्या करते हुए राष्ट्रसंत ने कहा कि समर्पण का वास्तविक अर्थ अपने अहंकार का विसर्जन है। जैसे नदी अपना अस्तित्व मिटाकर सागर में समा जाती है, वैसे ही साधक को भी अपने ‘मैं’ का त्याग कर गुरु के आदर्शों में स्वयं को समर्पित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि समर्पण बंधन नहीं, बल्कि आत्ममुक्ति का सबसे सरल मार्ग है।
साधना के विषय में उन्होंने कहा कि केवल धार्मिक क्रियाओं का पालन ही साधना नहीं है, बल्कि अपने भीतर के काम, क्रोध, लोभ और मोह का निरंतर शमन कर आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ना ही वास्तविक साधना है। श्रद्धा, समर्पण और सतत साधना के माध्यम से ही साधक सिद्धि के सर्वोच्च शिखर तक पहुँच सकता है।
अपने 12वें दीक्षा दिवस पर मुनि श्री संधान सागर महाराज ने कहा कि गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा केवल वंदना तक सीमित नहीं होती, बल्कि उनके बताए मार्ग को जीवन में अपनाने में निहित है। उन्होंने पूज्य पूर्णवती माताजी के वचनों का स्मरण कराते हुए कहा, “सुनने में जो आनंद है, वह बोलने में नहीं है।” इसलिए मनुष्य को अधिक सुनना और कम बोलना चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि गुरुवर ने समाज को आध्यात्मिकता, संस्कार, सेवा और आत्मजागरण के अनमोल सूत्र प्रदान किए हैं। गुणायतन केवल एक संस्था नहीं, बल्कि हृदय परिवर्तन का विराट अभियान है। भावनायोग, सेवा, गुरुकुल एवं अन्य सभी प्रकल्प समाज में संस्कारों और आध्यात्मिक चेतना के प्रसार के सशक्त माध्यम हैं।
उन्होंने समाज का आह्वान करते हुए कहा कि गुरुवर के “जैन पढ़ाओ, जैन बढ़ाओ और जैन बचाओ” संदेश को जन-जन तक पहुँचाना समय की आवश्यकता है। साथ ही गुरु पूर्णिमा को धैर्य, इच्छाशक्ति, समझ और आत्मबल के विकास का संकल्प दिवस बनाकर जीवन में उतारने का आह्वान किया।
इस भव्य आध्यात्मिक आयोजन में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, पश्चिम बंगाल सहित इंदौर, भोपाल, जबलपुर, दमोह, कटनी, कोलकाता तथा देश-विदेश के अनेक क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर गुरु भक्ति और धर्म के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312


