न्याय पूर्वक धन का उपार्जन करना अर्थ पुरुषार्थ है आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज
रामगंजमंडी
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने प्रवचन देते अर्थ पुरुषार्थ और काम पुरुषार्थ को समझाया उन्होंने कहा अर्थ का अर्थ धन होता है यह बात निश्चित है कि बिना धन के काम नहीं चलता पक्का मान लेना कि गृहस्थ जीवन में तो नहीं चलता अर्थ की गृहस्थ जीवन में बहुत बड़ी आवश्यकता है घर परिवार चलाना है बच्चों की परवरिश करना है और उन्हें पढ़ाना लिखाना है, गृहस्थ के लिए धन बहुत जरूरी है और इसके अर्जन के लिए पुरुषार्थ भी करना पड़ेगा। इसे कमाने के लिए यह उद्देश्य भी बनाना होगा कि हमें धन अर्जन कैसे करना है।
अर्जन के प्रकारों के विषय में बताते हुए कहा कि व्यापार नौकरी आदि से धन अर्जन होता है, और भी अन्य कारणों से धन अर्जन हो सकता है। धन कमाने का तरीका कही प्रकार का हैं। लोग बेईमानी से भी धन कमाते हैं और ईमानदारी से भी कमाते हैं,। धन कमाते है तो यह भाव आता है कि अधिक से अधिक धन कमाए और अधिक से अधिक धन आ जाए। लेकिन जैन दर्शन कहता है कि न्याय पूर्वक धन का उपार्जन करना उन्होंने कहा कि शब्द बहुत छोटा है न्याय का अर्थ होता है जो मेहनत के द्वारा सत्य बोलकर जरूरत के हिसाब से धन का संग्रह किया जाए। उन्होंने कहा लोगों को जरूरत की चिंता नहीं है लोगो को जरूरत से ज्यादा धन की चिंता है।
साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय । मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय
इस दोहे के माध्यम से गुरुदेव ने बताया की यह न्यायपूर्वक बात है उन्होंने बताया कि परिश्रम से इतना मिले कि परिवार चल सके अतिथि संविभाग हो सके उन्होंने कहा कि लेकिन अतिथि संविभाग से पहले परिवार की जिम्मेदारी है बाद में अतिथि की जिम्मेदारी है। पहले गृहस्थ की बात बाद में अतिथि की गृहस्थी का पालन पोषण करें उसे मुकाम तक ले जाएं परिवार के लिए पर्याप्त हो तो अतिथि संविभागकरो नहीं तो मत करो और यदि पर्याप्त है तो अतिथि संविभाग रोज करना चाहिए। 


प्रमाद के कारण धन का सही उपयोग नहीं हो रहा
आचार्य श्री ने कहा कि प्रमाद के कारण हमारे द्वारा धन का सही उपयोग नहीं हो रहा है जैन दर्शन कहता है कि परिवार घन से चलता है जीवन यापन में धन की बहुत-बहुत जरूरत है। लेकिन न्याय पूर्वक धन संग्रहण करना चाहिए। परिवार की बहुत अच्छे से परवरिश करना चाहिए बचे तो दान करना चाहिए न बचे तो दान करने की जरूरत नहीं है। अर्थ पुरुषार्थ न्यायपूर्वक ही होता है। क्योंकि अर्थ से ही धर्म ध्यान होता है और अर्थ से ही मोक्षमार्ग मिलता है। तारतम्यता जुड़ी हुई है अर्थ यदि न्याय पूर्वक संग्रहण किया गया है तो वह तुम्हे धर्म से जोड़ेगा। आपने भोजन किया और आपने न्याय पूर्वक धन अर्जन किया है तो आपका मन धर्म ध्यान में अधिक लगेगा। और यदि आपने अन्याय पूर्वक धन अर्जन किया है तो आपका मन इंद्रिय विषयों के प्रति ज्यादा आकर्षित होगा।
वर्तमान में लोगों का मन धर्म ध्यान में इसलिए नहीं लगता क्योंकि जो भोजन आप कर रहे हैं जो रक्त आपकी धमनियों में दौड़ रहा है सोच विचार आ रही हैं वह ठीक नहीं है, जब आप किसी वस्तु को ग्रहण कर रहे हैं वह कैसे आई है किस तरीके से आई है उस पर विचार करना चाहिए
धन कमाने का पुरुषार्थ मत करो पुण्य कमाने का पुरुषार्थ करो
आचार्य श्री ने कहा धैर्यता के बिना धर्म नहीं होता जिसके पास धैर्य नहीं होता उसकी नियत भी खराब होती है। धन का या तो सदुपयोग हो सकता है या दुरुपयोग हो सकता है। धन का दुरुपयोग दुर्गति और पाप का कारण है। आप सुविधा और भौतिकता के नाम पर धन का दुरुपयोग कर रहे हो आप सोचते हो समय बच जाता है मेहनत नहीं लगती है इसके नाम पर धन का सीधा सीधा दुरुपयोग है। यह अर्थ पुरुषार्थ के विरुद्ध है। शरीर से परिश्रम होना चाहिए और हिंसा कम होनी चाहिए।
धन कमाने का पुरुषार्थ मत करो पुण्य कमाने का पुरुषार्थ करो
जैन दर्शन कहता है कि व्यक्ति धन के साथ धर्म करता है तो तो पुण्य के साथ धन की भी वृद्धि होती है। उन्होंने कहा कि आपकी मेहनत और पुरुषार्थ को यदि पुण्य का सपोर्ट नहीं मिलेगा तो धन प्राप्त नहीं होगा क्योंकि यदि पुण्य की वृद्धि नहीं होगी तो धन नहीं मिलेगा। और यदि मिल भी जाता है तो भाग्य में नहीं है तो वह छिन जाता है। हम जीवन में देखते हैं कि यदि हमने किसी को धन दे दिया तो लेने में पसीना आता है पुण्य है तो धन की अनुकूलता है यदि पुण्य से धन आएगा तो वह कार्य करेगा और यदि पाप से आया है तो वह धन चला जाएगा।
धर्म ध्यान और धन के साथ होता है तो मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है धन पर उपयोग नहीं लगाना धर्म कर उपयोग लगाना चाहिए।
काम पुरुषार्थ
मनुष्य की चार संज्ञाएं. आहार, भय, मैथुन और परिग्रह इन चारों पर या तो कंट्रोल कर लो या पूर्ति कर लो। यह प्रत्येक जीव के पास है। यह संज्ञाएं प्रत्येक जीव को अपने अपने विषयों की और आकर्षित करती है। चाहे वो श्रावक हो या साधु हो निर्णय जीव का होता है कंट्रोल करना है या पूर्ति करना है।
उन्होंने साधक और श्रावक के विषय में बताते हुए कहा कि साधक होता है तो वह कंट्रोल करने पर निर्णय करता है और श्रावक जो होता है वह पूर्ति के साथ कंट्रोल करने पर विचार करता है। लेकिन कंट्रोल तो दोनों को ही करना पड़ता है।
स्वदार संतोष व्रत
श्रावक के स्वदार संतोष व्रत के लिए कहा गया इसका मतलब बताते हुए कहा कि एकदेश ब्रह्मचर्य कंट्रोल नहीं कर सकता विवाह किया यही तक सीमित रहो इसके अलावा मन वचन काय इधर-उधर नहीं जाना चाहिए। इसी व्रत में संतुष्ट रहो। इसका अर्थ है मै गृहस्थ में रहकर अपनी पत्नी में ही संतुष्ट हु इसके अलावा इसके अलावा सारी स्त्रियां या तो माता है या बहिन है या पुत्री है। इससे आप डिगते हो तो आप काम पुरुषार्थ से रहित हो। आप अनाचारी हो चाहे वो मन वचन काय से ही क्यों न हो उन्होंने कहा आसान नहीं है काम पुरुषार्थ आपको कंट्रोल करते हुए भी कंट्रोल करना है यह पुरुषार्थ है। श्रावक यदि स्वदार व्रत में है तो पाप की जगह पुण्य में भागीदार है। धर्म संरक्षण नहीं देगा या आप धर्म का संरक्षण नहीं लेंगे और आपका लक्ष्य अर्थ प्रयोजन मोक्ष नहीं होगा तो यह दोनों आपकी दुर्गति नियम से कराएंगे। यही कारण शुरू में धर्म पुरुषार्थ कहा गया और अंत में मोक्ष पुरुषार्थ का गया ताकि इन दोनों पुरुषार्थों का आप संतुलन बना सके और इन दोनों पुरुषार्थों को समझकर न्यायपूर्वक उपयोग कर सकें ताकि आप दुर्गति से बच सके। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि ध्यान रखना आपका ही किया हुआ आपके ही सामने आएगा। दूसरे का नही ईश्वर कौन होता है आपको स्वर्ग और नरक भेजने वाला, आपकी दुर्गति और आपकी सद्गति करने वाला। आपका किया आपके सामने आएगा। 17 sept की बेला में समाज के आधार स्तंभ रहे एवं समाज के पूर्व अध्यक्ष श्री राजमल जैन लुहाड़िया की अष्टम पुण्यतिथि पर उन्हें भावाँजली दी गई समाज की ओर से महामंत्री राजकुमार गंगवाल ने उनके प्रति भावांजली दी उनके द्वारा किए गए कार्यों को सभी के स्मृति पटल पर रखा।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312





