:गुरु ही भगवान तक पहुँचने का दिव्य सेतु, गुरु के बिना आत्मा और परमात्मा की पहचान असंभव : मुनिश्री योगसागर महाराज
गुरु पूर्णिमा पर पुण्योदय अतिशय क्षेत्र नसियां जी में उमड़ा श्रद्धा का सागर, गुरु महिमा, आत्मजागरण और तत्त्वचिंतन से भावविभोर हुए श्रद्धालु
कोटा, 29 जुलाई।
श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज के सान्निध्य में भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। गुरु वंदना, णमोकार महामंत्र, जिनभक्ति और आत्मचिंतन की दिव्य भावधारा से संपूर्ण मंदिर परिसर गुंजायमान रहा। धर्मसभा में बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने गुरु महिमा पर आधारित ओजस्वी प्रवचनों का श्रवण कर आत्मकल्याण एवं धर्ममय जीवन जीने का संकल्प लिया।
मंदिर के निदेशक हुकम जैन ‘काका’ एवं अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि गुरु पूर्णिमा के अवसर पर मुनिश्री ने गुरु के वास्तविक स्वरूप, उनकी आध्यात्मिक महत्ता तथा आत्मोन्नति में उनकी अनिवार्य भूमिका का अत्यंत मार्मिक एवं तत्त्वज्ञानपूर्ण निरूपण किया।

गुरु ही भगवान तक पहुँचने का दिव्य मार्ग
धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने कहा कि गुरु का स्थान संसार में सर्वोपरि है, क्योंकि गुरु ही वह दिव्य सेतु हैं जो जीव को भगवान तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान शाश्वत हैं, जिनवाणी सनातन है और शास्त्र अमर हैं, लेकिन इन सबका वास्तविक बोध गुरु ही कराते हैं। गुरु का दर्शन सत्य का दर्शन है और गुरु वंदना सत्य की वंदना है। गुरु के बिना धर्म केवल शब्दों तक सीमित रह जाता है, जबकि गुरु की कृपा से वही धर्म जीवन का अनुभव बन जाता है।

समवशरण की घटना से समझाया गुरु तत्त्व का महत्व
मुनिश्री ने भगवान महावीर के केवलज्ञान उपरांत समवशरण की ऐतिहासिक घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि केवलज्ञान प्राप्ति के बाद 66 दिनों तक कोई गणधर उपस्थित नहीं था, इसलिए दिव्यध्वनि का रहस्य जनसामान्य तक नहीं पहुँच सका। बाद में सौधर्म इन्द्र ने ब्राह्मण रूप धारण कर विद्वानों को समवशरण तक पहुँचाया। भगवान के दर्शन मात्र से उनका मिथ्यात्व दूर हुआ और सम्यग्ज्ञान का उदय हुआ। यही गुरु तत्त्व की महिमा है, जो अज्ञान के अंधकार को हटाकर सत्य का प्रकाश करता है।

गुरु कृपा से साधारण शिष्य भी बन सकता है युगपुरुष
अपने प्रेरणादायी प्रवचन में मुनिश्री ने कहा कि कर्मों की व्यवस्था अत्यंत सूक्ष्म है, इसलिए प्रत्येक साधक को अहंकार छोड़कर गुरु के मार्गदर्शन में आत्मशुद्धि का पुरुषार्थ करना चाहिए। उन्होंने आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज का उदाहरण देते हुए कहा कि गुरु की कृपा, तप और साधना के बल पर साधारण जीवन भी असाधारण बन सकता है। सच्ची गुरु भक्ति वही है, जिसमें शिष्य स्वयं को निरंतर श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करे।
गुरु के बिना न भगवान की पहचान, न आत्मा का साक्षात्कार
धर्मसभा में क्षुल्लक 105 संयम सागर महाराज ने कहा कि यदि गुरु और भगवान दोनों एक साथ उपस्थित हों तो सर्वप्रथम गुरु के चरणों में वंदना करनी चाहिए, क्योंकि गुरु ही भगवान का वास्तविक परिचय कराते हैं। उन्होंने कहा कि गुरु के बिना न भगवान की पहचान संभव है और न ही आत्मा का साक्षात्कार। गुरु अज्ञान का अंधकार मिटाकर ज्ञान का दीप प्रज्ज्वलित करते हैं और जीव को आत्मकल्याण की दिशा में अग्रसर करते हैं।
गुरु भक्ति से सराबोर रहा मंदिर परिसर
गुरु पूर्णिमा महोत्सव के दौरान गुरु वंदना, मंगल स्तवन और जिनभक्ति की स्वर लहरियों से संपूर्ण मंदिर परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत दिखाई दिया। श्रद्धालुओं ने गुरु चरणों में विनय अर्पित कर धर्म, संयम और साधना के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। महिला मंडलों ने पारंपरिक वेशभूषा में संगीतमय पूजा कर अष्टद्रव्य समर्पित किए, वहीं बालिका छात्रावास की छात्राओं एवं समाजजनों ने भी श्रद्धाभाव से पूजा-अर्चना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
गुरुवाणी के अमृत संदेश
▪️ गुरु ही भगवान तक पहुँचने का दिव्य सेतु हैं।
▪️ गुरु के बिना भगवान की पहचान और आत्मा का साक्षात्कार संभव नहीं।
▪️ गुरु अज्ञान का अंधकार मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं।
▪️ सच्ची गुरु भक्ति आत्मशुद्धि, विनय और साधना से प्रकट होती है।
▪️ गुरु कृपा से साधारण शिष्य भी महान व्यक्तित्व बन सकता है।
▪️ आत्मकल्याण का मार्ग गुरु के मार्गदर्शन, संयम और पुरुषार्थ से प्रशस्त होता है।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी




