इच्छा कामना रखते हुए धर्म करना भी व्यसन है कनकनंदी गुरुदेव

धर्म

इच्छा कामना रखते हुए धर्म करना भी व्यसन है कनकनंदी गुरुदेव
सागवाडा
जिनवाणी नंदन वैज्ञानिक धर्माचार्य कन नंदी गुरुदेव ने अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि आत्मस्वभाव से भ्रष्ट होना व्यसन हैं। आत्मा को परमात्मा बनाने के कार्य को छोड़कर अन्य सभी कार्य व्यसन है। आत्मविशुद्धि भाव विशुद्ध ही धर्म है। इच्छा कामना रखते हुए धर्म करना भी व्यसन हैं।

 

हमारे शरीर में 100000 करोड़ सेल्स होते हैं वह व्यवस्थित होने पर शरीर स्वस्थ रहता है अव्यवस्थित होने पर अस्वस्थ हो जाते हैं। उपव्यसन में मनोविनोद में प्रतिस्पर्धा करना भी जुआ है किसी की हर होना या जीत होने का सोचना भी व्यसन है पाप है। भगवान की मूर्ति पद्मासन में ध्यान अवस्था में होती है भगवान की मूर्ति हाथ उठाते हुए या अस्त्र-शस्त्र से सहित नहीं होती क्योंकि भगवान किसी का भला या बुरा होने का आशीर्वाद नहीं देते हैं। हमारा समर्पण हमारी भावना जितनी शुद्ध होती है पवित्र होती है उसके अनुसार हमारा कार्य होता है। भगवान कुछ नहीं करते हम हमारे कर्म के माध्यम से उनकी पूजा प्रशंसा के माध्यम से हमारे भावों को पवित्र करते हैं जिससे हमारे कार्यों की सिद्धि होती है।  

आचार्य श्री कनकनदी गुरुदेव भी कभी अपने आप को अच्छे कार्यों का श्रेय नहीं देते सभी के लिए समान आशीर्वाद धर्म वृद्धि का देते हैं। सभी भक्त शिष्यों के कार्य उनके आशीर्वाद से अच्छे होते हैं परंतु आचार्य श्री कहते हैं यह तुम्हारे अच्छे भावों का अच्छे कर्मों का फल हैं मैं कुछ नहीं करता निष्काम भक्ति से सभी कार्यों की सिद्धि होती है। आचार्य श्री कहते हैं जहां भी प्रतिस्पर्धात्मक कार्य होते हैं व्यापार हो पढ़ाई हो नौकरी हो सब जुआ है व्यसन है। महावीर भगवान अपने श्रेष्ठ शिष्य गौतम गणधर से कहते हैं कि प्रमाद में एक समय भी व्यतीत नहीं करना चाहिए। दूसरों को नीचा दिखाने के लिए खेलना दौड़ना हार जीत के लिए खेलना प्रतिस्पर्धा करना सब जुआ हैं। विकलांग गरीब असहाय का अपमान करना पाप है जुआ है तंबाकू बीडी सिगरेट को केवल खाने में ही पाप नहीं उसके क्रय विक्रय उत्पादन करने में इससे भी अधिक पाप लगता है मांस तथा हड्डी तथा इससे निर्मित वस्तुओं का क्रय विक्रय करना भी पाप है। अमर्यादित समस्त भोजन भी मांस है शराब है। चमड़े के बर्तन में रखी हुई समस्त वस्तुएं रेडिमेड भोजन सब अभक्ष्य है। अंकुरित भोजन अचार मुरब्बा पापड़ सब अभक्ष्य हैं। रात्रि भोजन करना मांस खाने के बराबर है। वेबीनार का प्रारंभ मुनि श्री सुविज्ञ सागरजी गुरुदेव की कविता “मेरी ही प्रतिस्पर्धा मेरे ही साथ ” के द्वारा हुआ विजयलक्ष्मी जैन से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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