केपाटन में आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी एवम विशुद्धमति माताजी का हुआ मंगल प्रवेश, बैंडबाजे के साथ निकली शोभायात्रा स्वाध्याय से प्राप्त ज्ञान जीवन को देता है सही दिशा माताजी
केशवरायपाटन
श्रीमुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र में शनिवार को आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी और आर्थिका विशुद्धमति माताजी का ससंघ मंगल प्रवेश हुआ। जैन समाज उमड़ पड़ा। दोनों माताजी को शहर के मुख्य मार्गों से बैंडबाजे के साथ चंबल नदी तट स्थित अतिशय क्षेत्र तक लाया गया। वहां श्रद्धालुओं ने उत्साह के साथ स्वागत किया।
मार्ग में जगह-जगह जैन समाज की महिलाओं और पुरुषों ने अगवानी की। अतिशय क्षेत्र प्रबंधन कमेटी, महिला मंडल, नवयुवक मंडल के सदस्य आयोजन में सक्रिय रहे। पुराने बस स्टैंड और अतिशय क्षेत्र में माताजी का पद-प्रक्षालन किया गया। स्वस्ति भूषण माताजी पदमपुरा से विहार कर अतिशय क्षेत्र पहुंचीं। विशुद्धमति माताजी कोटा से विहार कर अतिशय क्षेत्र पहुंचीं। दोनों संघों का यहांवात्सल्य मिलन हुआ।

स्वस्ति भूषण माताजी ने कहा कि दोनों ही संघ एक ही गुरु-परंपरा से जुड़े हैं। यह परंपरा आचार्य शांतिसागर छाणी वाले महाराज से चली आ रही है। उन्होंने कहा कि हम सभी उनकी लगाई हुई बगिया के फूल हैं। हम देशभर में भ्रमण कर ज्ञान की सुगंध फैला रहे हैं। उन्होंने बताया कि इच्छाएं आकाश की तरह विशाल होती हैं। उनकी पूर्ति करना संभव नहीं है।
विशुद्धमति माताजी ने स्वाध्याय और ज्ञान के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि स्वाध्याय से कर्मों की निर्जरा होती है। आत्मा का कल्याण होता है। स्वाध्याय से प्राप्त ज्ञान जीवन को सही दिशा देता है।
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आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी के सानिध्य में श्रीमुनिसुव्रतनाथ स्वामी अतिशय क्षेत्र में अप्रैल 2024 में चंबल नदी तट पर जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया था। इसमें 1008 जोड़ों ने सामूहिक मंडल विधान किया था। तीन वर्ष बाद माताजी के सानिध्य में 11 व 12 अप्रैल को जन्मकल्याण महोत्सव किया जाएगा, जिसकी तैयारियां शुरू हो गई है।
अच्छे ग्रंथों के पढ़ने से विचार शुद्ध होते हैं
विशुद्धमति माताजी के अनुसार स्वाध्याय (स्वयं अध्ययन) मनुष्य के जीवन को सही मार्ग पर ले जाने का सबसे सशक्त माध्यम है। उनका कहना है कि जब व्यक्ति नियमित रूप से अच्छे ग्रंथों, धार्मिक पुस्तकों और प्रेरणादायक विचारों का अध्ययन करता है, तो उसके विचार शुद्ध और सकारात्मक बनते हैं। स्वाध्याय से व्यक्ति अपने भीतर छिपी क्षमताओं को पहचानता है और सही-गलत का विवेक विकसित करता है। यह न केवल ज्ञान बढ़ाता है, बल्कि आत्मविश्वास और आत्मबल भी मजबूत करता है। माताजी बताती हैं कि आज के व्यस्त जीवन में लोग बाहरी साधनों में उलझ जाते हैं, जबकि स्वाध्याय उन्हें आत्मचिंतन और आत्म विकास की ओर ले जाता है। अतः नियमित स्वाध्याय अपनाकर व्यक्ति अपने जीवन को संतुलित, सार्थक और उद्देश्यपूर्ण बना सकता है। समाज में भी सकारात्मक योगदान दे सकता है।
माताजी की प्रेरणा से शुरू हुआ जीर्णोद्धार
चंबल नदी किनारे अतिप्राचीन जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर श्रीमुनिसुव्रतनाथ स्वामी के अतिशय क्षेत्र का जीर्णोद्धार आर्यिका स्वस्ति भूषण माताजी के सानिध्य में शुरू हुआ था, जो तेजी से चल रहा है। श्रद्धालुओं के समक्ष भू-गर्भगृह में आने वाली समस्या को लेकर माताजी ने महामस्तकाभिषेक में मंदिर के मूलस्वरूप को बदलने का संकल्प दिलाया था। मंदिर के भू-गर्भगृह में मूलनायक प्रतिमा को यथास्थान पर ही रखा गया है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

