जब अपने पास संकल्प शक्ति हो तो अपन सारी सृष्टि को अपनी मुट्ठी में बांध सकते हैं सुधासागर महाराज
भाग्योदय तीर्थक्षेत्र, सागर
कोई भी क्रिया अच्छी बुरी नहीं होती, ये सृष्टि सापेक्षवाद के सिद्धान्त पर व्यवस्थित चल रही है तो सापेक्षवाद का सिद्धान्त है- ‘न यह सत्य है, न वह सत्य है, यह भी सत्य है और वह भी सत्य है। सापेक्षवाद का सिद्धांत अभावरूप भी है और सद्भावरूप भी है। इस दुनिया मे कुछ भी नही है ये अभावरूप हुआ, इस दुनिया में सबकुछ है यह सद्भाव रूप हुआ। क्रिया बंध का कारण नही है, अभिप्राय बंध का कारण होता है। ये दुनिया विनाशशील नही है, हम विनाश को देखते है इसलिए विनाश दिखता है, हम विनाश को देखना बंद कर दे कोई भी चीज मिटती हुई नजर नही आएगी। हमारी दृष्टि में सृष्टि का स्वरूप क्या है?
भाग्योदय तीर्थ सागर में मंगल प्रवचन देते हुए मुनि श्री ने आगे कहा कि पहले नंबर का व्यक्ति वह है जो सबसे ज्यादा निकृष्ट है, सदा अभाव की अनुभूति करता है। अभाव में सद्भाव की अनुभूति दूसरे नम्बर का व्यक्ति करता है जो उसके पास है उसकी अनुभूति करता है। तीसरे नम्बर पर जो सर्वश्रेष्ठ है वह है सद्भाव में अभाव की अनुभूति करना। वस्तु है, शरीर है लेकिन उसे शरीर का अनुभव नही हो रहा है, मर रहा है लेकिन मौत का अनुभव नही हो रहा है। देख रहा है लेकिन देखने की अनुभूति नही होती, इसी का नाम है त्याग, तपस्या। सबकुछ सामने मौजूद है लेकिन सद्भाव को वह अभाव में बदल देता है। मिलने पर यदि त्याग किया जाए तो वह त्याग है, नही मिलने पर त्याग किया तो उस त्याग का कोई मतलब नही है।

उन्होंने कहा की हम साधुओं के लिए सारी वस्तुये उपकारी है तो भी त्यागना है क्योंकि वह पर है। आप लोगों की पहचान होना चाहिए कि आपको धन दौलत सबकुछ मिला रहा था लेकिन वह तुम्हें धर्म से वंचित कर देगा, गुरु को आहार देने से वंचित हो जाओगे, भगवान के अभिषेक से वंचित हो जाओगे। यदि ऐसा भाव तुम्हारे मन में आ जाये कि जिन जिन कार्यो से हम धर्म से, धर्मात्मा से वंचित हो जायेंगे, वे वे कार्य मैं कर सकता हूँ, करने में समर्थ हूँ लेकिन मैं नही करूँगा, मैं ऐसे कार्यो का त्याग करता हूँ।
उन्होंने मृत्यु के संबंध में व्याख्या करते हुए कहा कि यदि कभी तुम्हे मौत का समय पता चल जाये, बस अपने आपको स्वयं को संसार का सबसे बड़भागी मानना है, मैं वह व्यक्ति हूँ जिसे मौत का पता चल गया कि मैं मरने वाला हूँ। बहुत बड़ी गॉड गिफ्ट है कि तुम्हे मरने का समय पता चल गया, चाहे भले वह फाँसी भी क्यों न हो। अधिक समय तो मैं परिणाम नही सम्भाल सकता था लेकिन 5 मिनिट को तो मैं परिणाम संभाल सकता हूँ, फांसी पर चढ़ रहा है, अंजन चोर का उदाहरण देते हुए महाराज श्री ने कहा कि अंजन चोर जैसा पापी है, बहुत पाप करके आया है और उस समय चिन्तन चल रहा है आत्मा स्वभाव परभाव भिन्नं, मैं अजर अमर अविनाशी शाश्वत चैतन्य आत्मा हूँ। फांसी के फंदे से भी वह सीधे 16वे स्वर्ग चला गया, व्रत ले लिया मैं सब परिग्रह का त्याग करता हूँ।
उन्होंने प्रेरित करते हुए कहा कि आज से बस एक ही प्रार्थना करो भगवान से कि भगवन मुझे कुछ नही चाहिए, सब मेरे पास है, जब मैं मरूँ तो मरने के पहले मुझे अपना पता चल जाये कि मैं आज मरने वाला हूँ, उतने मैं ही तुम ज्ञानी व्यक्ति कहलाओगे। जब अपने पास संकल्प शक्ति हो तो अपन सारी सृष्टि को अपनी मुट्ठी में बांध सकते हैं। सारी दुनिया अपने अनुसार चलने को तैयार हो जाएगी, बस संकल्प हमें चाहिए।
उन्होंने गुरु की व्याख्या करते हुएकहा कि गुरु से भी बड़ी है गुरु की आज्ञा और भगवान से भी बड़ी है भगवान की आज्ञा। मुनि महाराज को भगवान ने जो आज्ञा दी है उसमे यदि एक को छोड़ना पड़ेगा, या तो भगवान छोड़ना पड़ेगा या भगवान की आज्ञा छोड़नी पड़ेगी तो हमारा कल्याण भगवान से नही, भगवान की आज्ञा, उपदेश मनाने से होगा। गुरु से बड़ी सम्पत्ति है गुरु की आज्ञा। गुरु के दर्शन करने का मन है, उपवास करने का मन है और गुरु मना कर रहा है तो नीति कहती है तुम्हारी भावना से कहीं गुना बड़ी गुरु की आज्ञा है। गुरु के मना करने पर उपवास का कोई ज्यादा फल नही मिलने वाला और एक व्यक्ति ने गुरु के मना करने पर आहार किया, हजारों, लाखों उपवासों से बहुत बड़ा पुण्य कर लिया क्योंकि वह आहार को भी गया तो गुरु की आज्ञा से गया।
हर गरीब को हर परेशान व्यक्ति को सोचना है कि यह मुझे अभिशाप नहीं है यह हमारी उद्दंडता के लिए सच्चे धर्म रूपी पिता का अंकुश है क्योंकि हम पापों को छोड़ नहीं पाए तो सच्ची जिनवाणी माँ कहती है ये पाप नही छोड़ पा रहा है तो पाप तो मैं इसे करने नही दूँगी तो उसका तरीका उसने गरीबी अपनाया, परेशानी अपनाया। ये गॉड गिफ्ट है तुम्हे गरीबी नही दी है, तुम्हे पाप से बचाया गया है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
