चांदखेडी पंचकल्याणक
केवली स्वरूप से हुआ मोक्ष, बने देवाधिदेव 1008आदिनाथ भगवान
चांदखेडी
विश्व प्रसिद्ध अतिशय क्षेत्र चांदखेडी मे संतशिरोमणी आचार्य भगवान् विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि पुंगव 108 श्री सुधासागर महाराज एवं प. पू. मुनि श्री 108प्रसाद सागर महाराज सहित कुल 9 मुनिराजो के ससंघ सानिध्य मे यह श्री मज्जिनेन्द्र जिनबिम्ब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव मे रविवार को अंतिम दिवस भगवान का मोक्ष कल्याणक सम्पन्न हुआ। मोक्षकल्याण की क्रिया मे केवली भगवान अष्टापद कैलाश पर्वत से इस शरीर को त्याग कर मोक्ष को चले गये। भगवान का परम पवित्र शरीर तो कपूर की भाँति उड जाता है। किंतु म नख एवं केशो मे आत्मा नही होती अतः सिर्फ वही शेष रह जाते है। और भगवान के शरीर मात्र से जुडे होने के कारण वजह निर्जीव होते हुए भी परम पवित्र होते है। तत्पश्चात् अग्निकुमार इन्द्रो द्वारा भगवान के नख-केशो का दाह संस्कार किया गया।

तीर्थंकर जन्म से पवित्र शरीर लेकर जन्म लेते है मुनि श्री
मुनि पुंगव सुधासागर महाराज श्री ने दिव्य देशना मे कहा कि तीर्थंकर जन्म से पवित्र शरीर लेकर जन्म लेते है और निर्वाण तक भी पवित्र रहते है। उनके जीवनभर नौ द्वार से कभी भी मल-मूत्र, पसीना, या कोई भी गंदगी इत्यादि विसर्जित नही होती। बल्कि उनके जन्म पर भी सूतक नही लगता। वह जीवन भर यह भूमि गंदी नही करते। इतने असीम पुण्य होते है तब वह तीर्थंकर बनते है। और देह त्याग के बाद तीर्थंकर के मात्र नख-केश शेष रहते है और उनका दाह संस्कार किया जाता है। वह दाह संस्कार स्थान भी बहुत पूज्यनीय हो जाता है, सिद्ध क्षेत्र बन जाता है। हम भावना भाये कि काश मन वचन काया से मै भी इतना पावन हो जाऊ कि तीर्थंकर की भांति ही मेरी मृत्यु भी पावन हो जाए। मोक्षगामी मृत्यु बन जाये। जब एक सिद्ध भगवान के निर्वाण होने से क्षेत्र विशेष इतना महान एवं पवित्र तीर्थ बन जाता है तो चांदखेडी मे सभी निर्वाण क्षेत्र के भगवान की आज प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित की है तो आज से यह महातीर्थ क्षेत्र बन गया है। जो व्यक्ति जीवन मे किसी क्षेत्र के दर्शन ना कर सके वह एक बार चांदखेडी के दर्शन कर सभी सिद्ध क्षेत्र के दर्शन का पुण्य अर्जित कर सकते है। मुनि श्री ने पुनः नारा दोहराया “सारे तीर्थ बार-बार, चंद्रोदय तीर्थ एक बार

भगवान की सच्ची अर्चना करो मुनि श्री
मुनि श्री ने अपने उद्बोधन मे आगे कहा एकलव्य ने द्रोणाचार्य के मात्र मिट्टी की बनी मूर्ति को सच्चे हृदय से अपना गुरू माना। और अर्जुन साक्षात गुरू के साथ रहकर धनुर्विद्या सीखते हुए भी एकलव्य से हार गया। और आप आज सभी इन निर्वाण कांड के सभी भगवान की प्रतिमाओ मे उनके अपने सिद्ध क्षेत्र मानकर भगवान की सच्ची अर्चना करो। फिर आपको आवश्यकता नही कि किसी क्षेत्र विशेष पर जाकर ही पूजन करे। साथ ही दोपहर मे महाराज श्री के ससंघ सानिध्य मे सभी प्रतिमाओ की वेदी प्रतिष्ठा हुई। यह जानकारी क्षेत्र अध्यक्ष हुकम काका एवं भगवान स्वरूप जैन देवरी, कैलाश भाल, महावीर जैन कालू, प्रशांत जैन, योगेश जैन जीवदया ने दी।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी
