भावना जब उपासना में ढल जाती है तब दीक्षा होती है–आर्यिका रत्न श्री आदर्श मति माताजी
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का पचंपन वा दीक्षा दिवस समारोह मनाया
अशोक नगर —
भावना जब उपासना में ढलकर अभिव्यक्ति में बदल जाती है तब दीक्षा होती है वस्त्र बदलने का नाम दीक्षा नहीं है। वही परिवर्तन के साथ अंतरंग परिवर्तन कर आत्मा के समीप पहुंचने का नाम दीक्षा है।अपने आपको गुरु चरणों में समर्पित करने का नाम दीक्षा है इसमें सिर्फ सर्वस्व समर्पण की प्रधानता होती है।
यह उदगार सन्त शिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के पचपन वे दीक्षा दिवस समारोह को सम्बोधित करते हुए आर्यिकारत्न श्री आदर्शमति माताजी ने व्यक्त किए
आर्यिका रत्न व नगर गौरव माताजी का 31वा दीक्षा दिवस

मध्यप्रदेश महासभा के संयोजक विजय धुर्रा ने बताया कि आज आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के दीक्षा दिवस के साथ आर्यिकारत्न श्री आदर्शमति माताजी दुर्लभ मति माताजी नगर गौरव आर्यिकारत्न श्री अनर्घमति माताजी के साथ नगर की माटी में पली बढ़ी आर्यिका श्री अनुग्रह मति माताजी,आर्यिका श्री आनंद मति माताजी के साथ ही सत्रह बहनों ने जैनेश्वरी दीक्षा सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर की पावन धरा आज के दिन सन1992मे ग्रहण की थी इनमें तीन माताजी हमारे नगर में विराजमान हैं
विशाल शोभायात्रा निकाली

प्रमुख जैनाचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के पचपन वे दीक्षा दिवस पर आर्यिकारत्न श्री दुर्लभ मति माताजी के पावन सानिध्य में भव्य शोभायात्रा निकाली गई जिसमें सौधर्म इन्द्र इंसान इन्द्र सनत इन्द्र महेन्द्र इन्द्र के साथ ही पिता मल्लपाजी माता श्रीमति, बहन शान्ताजी, सुवर्णा जी को विशेष बागियों में विराजमान शोभा यात्रा केआकर्षक का केन्द्र बने। यह शोभायात्रा सुभाष गंज मैदान में आकर धर्म सभा में बदल गई

आचार्य श्री का किया गुणानुवाद
इस दौरान आर्यिका श्री पारमति माताजी जी ने कहा कि समुद्र को नापने को कहा जा रहा है जो हमारे बस की बात नहीं है महापुरुष दूसरो के लिए व सामान्य व्यक्ति अपने लिए जीवन जीते है।समुद्र की गहराई नापने के लिए धागे में मिश्री बांधकर समुद्र में डालकर नापने पर कुछ भी हाथ नहीं लगता।आर्यिका श्री उपशम माताजी ने कहा कि हमारी बड़ी माताजी आचार्य श्री की दृष्टि को देखती नहीं है वे उनके संकेतों को पड़ने की कोशिश करते हैं। आर्यिकाश्री तथामति माताजी ने कहा कि आज आचार्य श्री का पचवनवा दीक्षा दिवस हम मना रहे हैं। पंगत में सबसे पहले पत्तल परोसी जाती है। फिर पत्तल में सभी सामग्री परोसी जाती है। वैसे ही शरीर को संस्कारित कर दीक्षा दी जाती है।

दीपक का भोजन अंधकार का भक्षण करना है
आर्यिकाश्री व्रतमति माताजी ने कहा कि दीपक का भोजन अधंकार का भक्षण करता है, अंधकार मिट जायेगा तब ही प्रकाश की महिमा को जगत जान सकता है। आर्यिकाश्री अमूल्य मति माताजी ने कहा कि सूरज अस्ताचल की ओर था सूरज जातें हुए बहुत चिन्तित था, तो कुछ रत्न आगे आये, और उन्होंने सूरज दादा से कहा कि आप चिन्ता ना करें। हम आपके जाने पर अंधकार को नहीं आने देंगे। आप जैसे तो नहीं लेकिन फिर भी जगत को रोशन करते रहेंगे।
आर्यिकाश्री दुर्लभ मति माताजी ने कहा कि आचार्य श्री शब्दों से नहीं वे अपनी चर्या से सबको जवाब दे दिया करते है। बड़ी माताजी स्नेह दीदी के नाम से जानी जाती थी वे हमेशा सभी पर अपना स्नेह बरसाती रहतीं हैं।
संकलन अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमडी
