हर मास एक उपवास से आत्मशक्ति, आत्मसंयम और आध्यात्मिक चेतना का जागरण होता है : अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

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हर मास एक उपवास से आत्मशक्ति, आत्मसंयम और आध्यात्मिक चेतना का जागरण होता है : अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

उपवास केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि कुविचारों से दूरी और आत्मा के निकट पहुंचने का सशक्त माध्यम है

सोनकच्छ (पुष्पगिरी तीर्थ)। परम पूज्य पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागरजी महाराज के पावन सानिध्य में व्रत चक्रवर्ती पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पीयूष सागरजी महाराज ससंघ पुष्पगिरी तीर्थ पर वर्षायोग हेतु विराजमान हैं। वर्षायोग के दौरान प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है। इसी धार्मिक श्रृंखला में गुरु सानिध्य में उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने उपवास के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हर मास एक उपवास आत्मकल्याण, आत्मसंयम और आत्मशक्ति जागृत करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

 

 

आचार्य श्री ने कहा कि दुनिया के लगभग हर धर्म और संस्कृति में उपवास को ईश्वर से जुड़ने तथा आत्मनियंत्रण प्राप्त करने का सशक्त माध्यम माना गया है। हमारी इंद्रियां प्रायः बाहरी सुखों, स्वाद और भोग-विलास की ओर आकर्षित होती हैं। उपवास के माध्यम से मनुष्य अपनी सबसे प्रबल इच्छा अर्थात भूख पर नियंत्रण करना सीखता है। जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त करता है, तब उसके भीतर अद्भुत आत्मबल और इच्छाशक्ति का संचार होता है।

उपवास शब्द की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि ‘उप’ अर्थात पास और ‘वास’ अर्थात रहना। इस प्रकार उपवास का अर्थ है अपने पास रहना, अपनी आत्मा के निकट रहना। भोजन की चिंता से मुक्त होकर जो समय बचता है, उसे जप, तप, ध्यान और स्वाध्याय में लगाना ही उपवास की वास्तविक सार्थकता है। उपवास आत्मा के शुद्ध स्वरूप और उसके गुणों का साक्षात्कार कराने वाला श्रेष्ठ मार्ग है।

 

आचार्य श्री ने उपवास की महत्ता को विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से समझाते हुए कहा कि उपवास वह वैद्य है, जो तन और मन को निरोगी बनाने की प्रेरणा देता है। उपवास वह सारथी है, जो आत्मारूपी रथ के इंद्रिय और मन रूपी घोड़ों को नियंत्रित रखता है। उपवास वह सेतु है, जो आत्मा और परमात्मा के बीच की दूरी मिटाने का मार्ग प्रशस्त करता है।

 

उन्होंने आगे कहा कि उपवास वह हंस है, जो आत्मा और शरीर के बीच नीर-क्षीर विवेक अर्थात भेद-विज्ञान कराता है। उपवास वह पैनी छैनी है, जो कर्मों के आवरण को हटाकर आत्मा के शुद्ध स्वरूप को प्रकट करने में सहायक बनती है।

आचार्य श्री ने विशेष रूप से कहा कि उपवास का अर्थ केवल पेट खाली रखना नहीं है, बल्कि अपने विचारों को शुद्ध करना, कुविचारों से दूर रहना, क्रोध और ईर्ष्या पर नियंत्रण रखना तथा सात्विक जीवन जीने का संकल्प लेना है। यदि उपवास के दौरान भी मन में क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या और द्वेष बना रहता है, तो वह केवल लंघन है, वास्तविक उपवास नहीं।

 

उन्होंने गुरु भक्तों को प्रेरित करते हुए कहा कि उपवास को केवल एक धार्मिक परंपरा या कर्मकांड तक सीमित न रखें, बल्कि इसे आत्मशुद्धि, आत्मनिरीक्षण और आत्मविकास का माध्यम बनाएं। नियमित रूप से संयम और साधना का अभ्यास जीवन को नई दिशा दे सकता है।

आचार्य श्री का संदेश यही है कि ‘हर मास एक उपवास’ का संकल्प लेकर व्यक्ति भोजन पर ही नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं, विचारों और इंद्रियों पर भी नियंत्रण करना सीखे। यही उपवास की वास्तविक साधना और आत्मकल्याण का मार्ग है।

 

प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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