दीपावली पर केकड़ी में खेली जाती है ‘अंगारों की होली दूसरे पर फेंकते हैं जलते पटाखे; हर साल झुलसते हैं लोग
40 साल पुरानी खतरनाक परंपरा! घंटाघर से सदर बाजार तक मचती है पटाखों की धमाचौकड़ी, त्योहार पर बाजारों में छा जाता है सन्नाटा; पुलिस ने दी सख्त कार्रवाई की चेतावनी
**केकड़ी।*
* देशभर में दीपावली का त्योहार दीपों की रोशनी, खुशियों और आतिशबाजी के साथ मनाया जाता है, लेकिन राजस्थान के केकड़ी शहर में दीपावली का एक ऐसा नजारा देखने को मिलता है, जो रोमांच से ज्यादा खतरे की घंटी बजाता है। यहां दीपावली और गोवर्धन पूजा के अवसर पर लोग एक-दूसरे पर जलते हुए पटाखे फेंकते हैं। स्थानीय स्तर पर इस खतरनाक गतिविधि को ‘अंगारों की होली’ कहा जाता है। करीब 40 साल से चली आ रही इस परंपरा के चलते त्योहार के दिन शहर के प्रमुख बाजारों में सन्नाटा पसर जाता है। दुकानदार अपनी दुकानें बंद कर देते हैं, वहीं महिलाएं और बच्चे घरों से बाहर निकलने से बचते हैं। स्थानीय स्तर पर हर साल 100 से अधिक लोगों के पटाखों से झुलसने की बात कही जाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर खुशियों के त्योहार पर जान जोखिम में डालने वाली इस परंपरा पर कब रोक लगेगी?
घंटाघर से बाजारों तक जलते पटाखों की बौछार
दीपावली और गोवर्धन पूजा के दिन केकड़ी के घंटाघर सहित प्रमुख बाजारों और चौराहों पर युवाओं के समूह एकत्रित होते हैं। इसके बाद शुरू होता है एक-दूसरे पर जलते हुए पटाखे फेंकने का सिलसिला। इस खेल में गंगा-जमना और सीता-गीता नाम के पटाखों का इस्तेमाल किए जाने की जानकारी सामने आती है।
बताया जाता है कि ये पटाखे पहले अनार की तरह आग की चिंगारियां और फव्वारा छोड़ते हैं तथा बाद में तेज धमाके के साथ फटते हैं। दोपहर से शुरू होने वाली यह गतिविधि देर रात तक जारी रहती है। इस दौरान बाजारों की गलियों में बारूद का धुआं फैल जाता है और जलते पटाखों की आवाज से पूरा क्षेत्र गूंज उठता है।

इस खतरनाक पटाखेबाजी के कारण राहगीरों के झुलसने, दुकानों में आग लगने और किसी बड़े हादसे की आशंका बनी रहती है। यही वजह है कि व्यापारी सुरक्षा के मद्देनजर अपनी दुकानें समय से पहले बंद कर देते हैं। त्योहार के दिन बाजारों में खरीदारी और सामान्य आवाजाही तक प्रभावित हो जाती है।

### घास भैरू की सवारी से जुड़ी है शहर की धार्मिक परंपरा
केकड़ी में गोवर्धन पूजा के दिन घास भैरू की सवारी निकालने की भी वर्षों पुरानी परंपरा है। शहर के मुख्य सदर बाजार स्थित गणेश प्याऊ चौराहे पर घास भैरू का शिलाखंड स्थापित है। स्थानीय मान्यता के अनुसार इस शिलाखंड में 36 करोड़ देवी-देवताओं का निवास है।

परंपरा के अनुसार पहले बैलों की सहायता से इस शिलाखंड को खींचकर नगर परिक्रमा कराई जाती थी। मान्यता है कि घास भैरू की नगर परिक्रमा से क्षेत्र में सालभर सुख-समृद्धि और धन-धान्य बना रहता है। समय के साथ बैलों की संख्या कम होने के कारण अब शिलाखंड को लकड़ी के पट्टे पर रखकर श्रद्धालुओं का समूह खींचता है और नगर परिक्रमा कराता है।

### बैलों को बिदकाने के लिए शुरू हुआ इस्तेमाल, फिर बन गया खतरनाक खेल
स्थानीय लोगों के मुताबिक, करीब चार दशक पहले शुरू हुई इस गतिविधि की वास्तविक शुरुआत के बारे में स्पष्ट जानकारी किसी के पास नहीं है। बताया जाता है कि पहले बैल पूजन और घास भैरू की सवारी के दौरान बैलों को बिदकाने के लिए पटाखे फेंके जाते थे। धीरे-धीरे कुछ युवकों ने एक-दूसरे पर जलते हुए पटाखे फेंकना शुरू कर दिया और देखते ही देखते यह गतिविधि दीपावली तथा गोवर्धन पूजा का हिस्सा बन गई।

हालांकि, अब यह परंपरा लोगों की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि त्योहार के नाम पर होने वाली इस तरह की पटाखेबाजी कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती है। इसकी चपेट में राहगीर, महिलाएं, बच्चे और दुकानदार कोई भी आ सकता है।
### पुलिस की दो टूक- परंपरा की आड़ में उपद्रव किया तो होगी कार्रवाई
खतरनाक पटाखेबाजी को लेकर पुलिस प्रशासन भी सख्त नजर आ रहा है। केकड़ी शहर थाना परिसर में आयोजित सीएलजी एवं शांति समिति की बैठक में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक राजेश कुमार मील ने पटाखे फेंकने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि दीपावली, बैल पूजन और घास भैरू की सवारी के दौरान परंपरा की आड़ में पटाखे फेंककर उपद्रव करने वाले असामाजिक तत्वों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा। शहर में कानून व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की प्राथमिकता है और किसी भी तरह का उपद्रव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

### परंपरा का सम्मान जरूरी, लेकिन लोगों की जान की कीमत पर नहीं
दीपावली खुशियों, प्रेम और आपसी सद्भाव का पर्व है। घास भैरू की सवारी जैसी धार्मिक परंपराएं शहर की सांस्कृतिक पहचान हैं, लेकिन जलते हुए पटाखे एक-दूसरे पर फेंकना किसी भी लिहाज से सुरक्षित नहीं कहा जा सकता। जरूरत इस बात की है कि धार्मिक परंपराओं और उत्सव की खुशियों को बरकरार रखते हुए खतरनाक गतिविधियों पर रोक लगे, ताकि दीपावली पर किसी परिवार की खुशियां मातम में न बदलें।
