कोटा दशहरे की रियासतकालीन परंपरा का निर्वहन, पूर्व महाराव इज्यराज सिंह ने किया कुंभ भेदन

धर्म

# कोटा दशहरे की रियासतकालीन परंपरा का निर्वहन, पूर्व महाराव इज्यराज सिंह ने किया कुंभ भेदन

## रावण दहन से पहले निभाई गई सदियों पुरानी रस्म, शाही वैभव और हाड़ौती की संस्कृति की दिखी अनूठी झलक

 

**कोटा।*

* कोटा का ऐतिहासिक राष्ट्रीय दशहरा मेला केवल रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों के दहन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हाड़ौती की समृद्ध विरासत, राजसी परंपराओं और जनआस्था का ऐसा संगम है, जिसकी पहचान सदियों से कायम है। इसी परंपरा की जीवंत झलक उस समय देखने को मिली, जब कोटा के पूर्व महाराव इज्यराज सिंह ने रावण दहन से पूर्व निभाई जाने वाली रियासतकालीन परंपरा **कुंभ (घड़ा) भेदन की रस्म** का निर्वहन किया। इस दौरान कुंवर जयदीप सिंह सहित पूर्व राजपरिवार के सदस्य पारंपरिक वेशभूषा में मौजूद रहे।

 

 

 

रावण दहन से पहले निभाई जाने वाली यह रस्म कोटा दशहरे की ऐतिहासिक पहचान और परंपरागत वैभव को दर्शाती है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही इस परंपरा के माध्यम से आज भी रियासतकालीन संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत को सहेजने का प्रयास किया जा रहा है।

### रावण दहन से पहले कुंभ भेदन की परंपरा

 

कोटा दशहरे में कुंभ अथवा घड़ा भेदन की रस्म का विशेष धार्मिक और सांकेतिक महत्व माना जाता है। परंपरा के अनुसार, रावण दहन से पूर्व मिट्टी के घड़े का पूजन किया जाता है और फिर पूर्व राजपरिवार के मुखिया द्वारा धनुष-बाण से उसका भेदन किया जाता है।

 

पौराणिक मान्यता के अनुसार, रावण की नाभि में अमृत कुंड होने के कारण उसका वध विशेष उपाय से ही संभव हुआ था। इसी प्रसंग को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करने वाली यह रस्म रावण दहन की प्रक्रिया से पहले निभाई जाती है। इसके संपन्न होने के बाद ही पुतलों के दहन की औपचारिक प्रक्रिया आगे बढ़ती है।

यह परंपरा केवल एक रस्म नहीं, बल्कि कोटा के ऐतिहासिक दशहरा उत्सव से जुड़ी उस सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, जिसमें धार्मिक आस्था, शौर्य और राजपरिवार की परंपराएं एक साथ दिखाई देती हैं।

 

### 1579 से शुरू हुआ दशहरे का ऐतिहासिक सफर

 

कोटा के दशहरा मेले का इतिहास भी बेहद गौरवशाली माना जाता है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, कोटा में दशहरे के सार्वजनिक आयोजन की शुरुआत वर्ष 1579 में राव माधोसिंह के शासनकाल से मानी जाती है। समय के साथ यह आयोजन धार्मिक उत्सव से आगे बढ़कर विशाल सांस्कृतिक मेले के रूप में विकसित हुआ।

महाराव उम्मेद सिंह प्रथम के शासनकाल में वर्ष 1899 के आसपास मेले को भव्य स्वरूप मिलने और विभिन्न परंपराओं के विस्तार का उल्लेख मिलता है। इसके बाद कोटा दशहरा मेला शहर की सांस्कृतिक पहचान बनता चला गया। आज भी इस आयोजन में इतिहास, लोकजीवन और धार्मिक उत्साह की झलक देखने को मिलती है।

 

### शाही सवारी से लेकर शस्त्र पूजन तक, हर रस्म का अपना महत्व

 

कोटा दशहरे की विशेषता यहां निभाई जाने वाली विविध रियासतकालीन परंपराएं हैं। विजयादशमी पर गढ़ पैलेस से निकलने वाली पारंपरिक शाही सवारी में सुसज्जित हाथी, घोड़े, ऊंट, पुलिस बैंड और अन्य पारंपरिक लवाजमे की झलक देखने को मिलती रही है। ऐतिहासिक रूप से यह सवारी राजसी वैभव और दशहरा उत्सव की गरिमा का प्रतीक रही है।

 

परंपरा में भगवान लक्ष्मीनाथ जी के विमान का भी विशेष स्थान है। इसके साथ धार्मिक प्रतीकों और राम-रावण युद्ध के प्रसंग से जुड़े आयोजन दशहरा उत्सव को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करते हैं।

 

दशहरे की सुबह शस्त्रों, तोपों और अश्वों के पूजन की परंपरा भी क्षत्रिय संस्कृति और ऐतिहासिक राजपरंपराओं से जुड़ी रही है। वहीं, नीलकंठ पक्षी के दर्शन को शुभ मानने की लोकमान्यता भी इस पर्व के सांस्कृतिक पक्ष को दर्शाती है।

 

रावण दहन के बाद आपसी मिलन, बधाइयों और पारंपरिक रूप से पान का बीड़ा भेंट करने जैसी रस्मों का भी रियासतकालीन सामाजिक जीवन में महत्व रहा है। इन परंपराओं में सम्मान, सद्भाव और सामाजिक मेल-मिलाप का संदेश निहित है।

 

### विशाल रावण का पुतला भी है कोटा दशहरे की खास पहचान

 

कोटा का दशहरा मेला अपने विशालकाय रावण के पुतले और आकर्षक तकनीकी प्रस्तुतियों के लिए भी प्रसिद्ध है। पुतले की पलकें झपकने, मुंह से धुआं और अंगारे निकलने तथा तलवार चलाने जैसी चलायमान विशेषताएं दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बनती हैं।

 

आजादी के बाद से दशहरा मेले के आयोजन में राजपरिवार की परंपराओं और स्थानीय प्रशासन की भूमिका अलग-अलग रूपों में बनी रही है। वर्तमान में नगर निगम की भागीदारी से यह आयोजन बड़े जनसमूह को आकर्षित करता है।

 

### परंपरा और आधुनिकता के संगम का प्रतीक है कोटा दशहरा

 

पूर्व महाराव इज्यराज सिंह द्वारा कुंभ भेदन की रस्म का निर्वहन इस बात को रेखांकित करता है कि कोटा का दशहरा केवल एक वार्षिक उत्सव नहीं, बल्कि ऐतिहासिक स्मृतियों और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा आयोजन है। बदलते समय के साथ मेले का स्वरूप भले ही विस्तृत हुआ हो, लेकिन इससे जुड़ी पारंपरिक रस्में आज भी लोगों के आकर्षण और जिज्ञासा का केंद्र बनी हुई हैं।

 

**कोटा का दशहरा अपनी इन्हीं ऐतिहासिक परंपराओं, धार्मिक आस्था और जनसहभागिता के कारण विशिष्ट पहचान रखता है। कुंभ भेदन जैसी रस्में इस विरासत को वर्तमान पीढ़ी से जोड़ते हुए हाड़ौती की सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत बनाए रखने का संदेश देती हैं।**

एक रिपोर्ट 

 

 

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *