आत्मिक शांति का मार्ग है समर्पण, संदेह नहीं : निर्यापक श्रमण मुनि 108 योगसागर जी महाराज
‘मेरा-तेरा’ का भाव त्यागकर समस्त जीवों के कल्याण की भावना अपनाएं; पुण्योदय नसियां जी में आज से आठ दिवसीय सिद्धचक्र महामंडल विधान का शुभारंभ
कोटा, 20 जुलाई।
श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी (दादाबाड़ी) में विराजमान निर्यापक श्रमण मुनि 108 योगसागर जी महाराज ने धर्मसभा में श्रद्धालुओं को आत्मकल्याण का संदेश देते हुए कहा कि यदि जीवन में वास्तविक सुख और आत्मिक शांति चाहिए तो संदेह का त्याग कर पूर्ण समर्पण को अपनाना होगा। जहां आत्मा शांत होती है, वहां शरीर भी स्वतः शांत हो जाता है। बाहरी साधन केवल शरीर को आराम दे सकते हैं, किंतु आत्मा की शांति धर्म, श्रद्धा और गुरु के प्रति समर्पण से ही प्राप्त होती है।
मुनिश्री ने कहा कि धर्म कोई विकल्प नहीं, बल्कि जीवन का शाश्वत सत्य है। जो व्यक्ति धर्म की शरण में जाता है, वही स्थायी सुख, शांति और आत्मकल्याण का अनुभव करता है। भगवान, गुरु और धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा ही आध्यात्मिक उन्नति का आधार है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि संदेह मोक्षमार्ग का सबसे बड़ा शत्रु है। गुरु को स्वीकार करने के बाद उनके प्रति किसी भी प्रकार का संशय साधना की सफलता में सबसे बड़ी बाधा बन जाता है।

उन्होंने कहा कि अध्यात्म का वास्तविक अर्थ संसार को जानना नहीं, बल्कि स्वयं को पहचानना है। आज मनुष्य दूसरों के दोष देखने में व्यस्त है, जबकि आत्मचिंतन और आत्मपरिष्कार से ही जीवन में वास्तविक परिवर्तन आता है। उन्होंने कहा कि धन, वैभव और संपत्ति को लोग कल्याण का साधन मानते हैं, जबकि वास्तविक कल्याण धर्म से होता है। यदि मन अशांत है तो अपार संपत्ति भी सुख नहीं दे सकती। दुःख का मूल कारण धन का अभाव नहीं, बल्कि लालसा, मोह और आसक्ति है।
मुनिश्री ने कहा कि प्रत्येक जीव में अनंत शक्तियां विद्यमान हैं, जिन्हें स्वाध्याय, पुरुषार्थ और अटूट श्रद्धा से जागृत किया जा सकता है। केवल विश्वास की बातें करना पर्याप्त नहीं, बल्कि अपने आचरण से विश्वास को सिद्ध करना ही सच्ची साधना है।
‘मेरा’ नहीं, ‘सबका’ भाव ही सच्चा धर्म
धर्मसभा में मुनिश्री ने कहा कि पूजा-अर्चना करते समय अधिकांश लोग केवल अपने और अपने परिवार के सुख की कामना करते हैं, जबकि धर्म हमें ‘मम’ (मेरा) से ऊपर उठकर ‘हम’ की भावना अपनाना सिखाता है। जब हम समस्त जीवों के मंगल और कल्याण की भावना रखते हैं, तब हमारा कल्याण भी उसमें स्वतः समाहित हो जाता है। उन्होंने कहा कि जहां स्वार्थ समाप्त होता है, वहीं से धर्म प्रारंभ होता है। ‘मेरा-तेरा’ का भाव ही संसार के बंधनों का कारण है।
भगवान हमसे दूर नहीं, हम भगवान से दूर हो रहे हैं
मुनिश्री ने कहा कि भगवान कभी हमसे दूर नहीं होते, बल्कि हमारा अहंकार, संदेह और आसक्ति ही हमें भगवान से दूर कर देती है। समर्पण का अर्थ है—अपने अहंकार का त्याग कर निस्वार्थ भाव से स्वयं को धर्म और गुरु के चरणों में अर्पित कर देना। आत्मा की निर्मलता ही जीवन की वास्तविक मांगलिकता है।
कोटा का सौभाग्य, गुरुवर आत्मकल्याण का मार्ग दिखाने आए हैं : क्षुल्लक संयम सागर
धर्मसभा में क्षुल्लक श्री 105 संयम सागर जी महाराज ने कहा कि कोटा के जैन समाज ने जिस श्रद्धा और भक्ति के साथ गुरुवर का मंगल प्रवेश कराया, वह अविस्मरणीय है। अब उसी श्रद्धा के साथ उनके ज्ञान, ध्यान और अध्यात्म का अधिकाधिक लाभ उठाना चाहिए। उन्होंने कहा कि गुरुवर किसी से कुछ लेने नहीं, बल्कि प्रत्येक आत्मा को आत्मकल्याण का मार्ग दिखाने आए हैं। ऐसे संतों का सान्निध्य अत्यंत दुर्लभ होता है और कोटा का यह परम सौभाग्य है।
मंगलवार से प्रारंभ होगा आठ दिवसीय सिद्धचक्र महामंडल विधान
मुख्य संयोजक धर्मचंद धनोप्या एवं अर्चना (रानी) जैन सर्राफ ने बताया कि मंगलवार से पुण्योदय नसियां जी में मुनिश्री के पावन सान्निध्य में आठ दिवसीय सिद्धचक्र महामंडल विधान का शुभारंभ होगा। प्रातः ध्वजारोहण के साथ विधान प्रारंभ होगा तथा मुख्य पात्रों का चयन किया जाएगा। आयोजन की सभी तैयारियां पूर्ण कर ली गई हैं। समिति ने श्रद्धालुओं से अधिकाधिक संख्या में उपस्थित होकर धर्मलाभ प्राप्त करने का आग्रह किया।
आज के पुण्यार्जक
समिति अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ एवं महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन राजेन्द्र हरसोरा, श्रीमती पुष्पा बाई बागड़िया, योगेश धीरावत (बांसवाड़ा) तथा श्रीमती सुशीला जी एवं विवेक ठोरा परिवार द्वारा किया गया। इस अवसर पर भगवान नेमिनाथ के निर्माणोत्सव पर लाडू चढ़ाकर श्रद्धापूर्वक उत्सव मनाया गया।
निदेशक हुकम जैन ‘काका’ ने बताया कि आज के श्रावक श्रेष्ठी बनने का सौभाग्य श्रीमती सुशीला एवं विवेक ठोरा परिवार को प्राप्त हुआ, जबकि शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन रामरतन आर.के. पुरम परिवार ने किया।
गुरुवाणी के प्रमुख संदेश
आत्मिक शांति ही जीवन की वास्तविक शक्ति है।
धर्म ही स्थायी सुख और आत्मकल्याण का मार्ग है।
संदेह त्यागकर समर्पण अपनाइए।
गुरु पर अटूट श्रद्धा रखें।
स्वयं को जानना ही सच्चा अध्यात्म है।
धन नहीं, धर्म वास्तविक कल्याण देता है।
लालसा और आसक्ति ही दुःख का मूल कारण हैं।
केवल अपने नहीं, समस्त जीवों के मंगल की भावना रखें।
— संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

