मंदिर केवल दर्शनस्थल नहीं, ज्ञान और आत्मकल्याण के संस्कार केंद्र हैं : स्वस्तिभूषण माताजी

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मंदिर केवल दर्शनस्थल नहीं, ज्ञान और आत्मकल्याण के संस्कार केंद्र हैं : स्वस्तिभूषण माताजी

शास्त्र लेखन, स्वाध्याय और साहित्य संरक्षण की प्राचीन परंपरा से नई पीढ़ी को जोड़ने का आह्वान

केशवरायपाटन।

साहित्य समाज का दर्पण होता है। इसके माध्यम से हमें अपने पूर्वजों, धर्म, संस्कृति, परंपराओं और आध्यात्मिक ज्ञान की अमूल्य विरासत को समझने का अवसर मिलता है। मंदिर केवल पूजा और दर्शन के स्थान नहीं, बल्कि ज्ञानार्जन, संस्कार निर्माण और आत्मकल्याण के केंद्र भी होने चाहिए।

 

 

अतिशय क्षेत्र में शुक्रवार को आयोजित धर्मसभा में भारत गौरव गणिनी आर्यिका रत्न 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने जैन धर्म में शास्त्र लेखन, स्वाध्याय और धार्मिक साहित्य के संरक्षण की प्राचीन परंपरा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने धर्म और ज्ञान की परंपरा को केवल अपने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए साहित्य का संरक्षण और प्रसार किया।

 

 

मंदिरों में होता था सामूहिक शास्त्र स्वाध्याय

स्वस्तिभूषण माताजी ने कहा कि लगभग 100-150 वर्ष पूर्व लोगों का जीवन प्रकृति से अधिक जुड़ा हुआ था। बिजली और आधुनिक मशीनों का व्यापक प्रचलन नहीं था। शाम होते ही दुकानें और दैनिक कार्य समाप्त करने के बाद लोग मंदिरों में एकत्रित होकर सामूहिक रूप से शास्त्रों का स्वाध्याय करते थे।

उस समय मंदिरों का निर्माण भी इस प्रकार किया जाता था कि समाज के लोग एक साथ बैठकर धार्मिक अध्ययन और चर्चा कर सकें। मंदिरों के आंगन और चबूतरों पर विशेषकर गर्मियों के दिनों में बैठकर स्वाध्याय किया जाता था। इससे मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थान न रहकर समाज के ज्ञान और संस्कार निर्माण के केंद्र बने रहते थे।

 

हाथ से लिखे जाते थे धर्मग्रंथ

माताजी ने बताया कि उस समय धार्मिक ग्रंथ हाथ से लिखे जाते थे। लेखन में दक्ष लोग पारिश्रमिक लेकर शास्त्रों की प्रतियां तैयार करते थे। संपन्न श्रावक इन ग्रंथों को लिखवाकर मंदिरों में दान करते थे। इसी परंपरा के कारण एक मंदिर से दूसरे मंदिर तक धर्म साहित्य पहुंचता रहा और ज्ञान की यह अमूल्य धरोहर पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित होती गई।

उन्होंने कहा कि आज आधुनिक साधन उपलब्ध हैं, ऐसे समय में हमें अपनी इस समृद्ध श्रुत और साहित्य परंपरा को और अधिक सहेजने की आवश्यकता है। नई पीढ़ी को शास्त्रों, स्वाध्याय और धार्मिक साहित्य से जोड़कर ही संस्कारों तथा आध्यात्मिक ज्ञान की इस परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाया जा सकता है।

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी


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