सहनशक्ति की सीमा टूटते ही फूट पड़ता है क्रोध का गुबार : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी
भीतर दबे क्रोध, कषाय, मान-अहंकार और इच्छाएं छीन रही हैं मनुष्य से सुख-शांति; मौन साधना में लिखित संदेशों के जरिए आचार्यश्री का जीवनोपयोगी मार्गदर्शन
सोनकच्छ।
मनुष्य के भीतर जमा हुआ क्रोध कब ज्वालामुखी बनकर फूट पड़े, इसका उसे स्वयं भी पता नहीं चलता। जब सहनशक्ति जवाब दे जाती है, तब भीतर दबा हुआ भाव क्रोध, विवाद और तनाव के रूप में बाहर आने लगता है। “जब सहन करने की शक्ति खत्म हो जाती है, तब क्रोध का गुबार फूट पड़ता है।” यह संदेश व्रत चक्रवर्ती, पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने मौन साधना के दौरान लिखित संदेश के माध्यम से दिया।
आचार्यश्री ने बताया कि मनुष्य अपने भीतर क्रोध, कषाय, मान, अहंकार और विषय-वासनाओं को दबाकर रखता है। ये भाव समाप्त नहीं होते, बल्कि भीतर ही भीतर जमा होते रहते हैं। जब उन्हें बाहर निकलने का अवसर मिलता है तो वे क्रोध, विवाद और मानसिक अशांति का रूप धारण कर लेते हैं।
दूसरों का विवाद देखकर क्यों रुक जाता है मन?
आचार्यश्री ने जीवन की सहज घटना का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि रास्ते में दो व्यक्ति लड़-झगड़ रहे हों और किसी व्यक्ति को कितना भी जरूरी काम हो, फिर भी उसका मन वहां रुककर विवाद देखने-सुनने के लिए आकर्षित होता है। आखिर ऐसा क्यों होता है?
उन्होंने बताया कि दूसरों के विवाद को देखकर हमारे भीतर दबा हुआ क्रोध का वेग जागृत होने लगता है। भीतर जमा गुबार जैसे बाहर निकलने के लिए अवसर तलाशता रहता है। यही कारण है कि व्यक्ति दूसरों के झगड़े में भी अनायास रुचि लेने लगता है।
परिवार में छोटी बात बन जाती है बड़े विवाद का कारण
आचार्यश्री ने कहा कि इसी मानसिक स्थिति का प्रभाव परिवार में भी दिखाई देता है। छोटी-छोटी बातों पर विवाद, तकरार और लड़ाई-झगड़े कई बार किसी एक घटना का परिणाम नहीं होते, बल्कि लंबे समय से भीतर दबे तनाव और भावनाओं का परिणाम होते हैं।
घर-परिवार में अनेक लोग अपनी इच्छाओं, नाराजगी और भावनाओं को भीतर दबाए रखते हैं। वे बाहर से शांत दिखाई दे सकते हैं, लेकिन भीतर भावनाओं का गुबार जमा होता रहता है। फिर कोई छोटी-सी घटना उस गुबार को बाहर आने का अवसर दे देती है।
भीतर के विकार शांत हुए बिना नहीं मिलेगी वास्तविक शांति
आचार्यश्री ने कहा कि जब तक मनुष्य के भीतर क्रोध, कषाय, मान, अहंकार और विषय-वासनाएं दबी हुई हैं, तब तक वास्तविक अमन-चैन संभव नहीं है। आज मनुष्य बाहर की सुविधाएं बढ़ाने में लगा है, लेकिन भीतर की अशांति लगातार बढ़ती जा रही है।
मनुष्य अपनी इच्छाओं और भावनाओं को दबाता चला जाता है और फिर उन्हीं दबे हुए विकारों से मानसिक तनाव और कुंठा उत्पन्न होती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति न सुखपूर्वक, न शांतिपूर्वक और न ही आनंदपूर्वक जीवन जी पाता है। वह जीवन को समझकर जीने के बजाय केवल आदतों के अनुसार जीता चला जाता है।
स्वयं के भीतर झांकना ही पहला कदम
आचार्यश्री ने संदेश दिया कि मनुष्य को दूसरों के दोष देखने से पहले अपने भीतर झांकना चाहिए। अपने भीतर उठ रहे क्रोध, कषाय और विकारों को पहचानना आवश्यक है। उन्हें दबाना समाधान नहीं, बल्कि उनके मूल कारण को समझकर शांत करना ही आत्मिक शांति की दिशा में पहला कदम है।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य अपने भीतर के गुबार को पहचानने लगता है, तब उसके जीवन में परिवर्तन की शुरुआत होती है। बाहरी परिस्थितियों को बदलने से पहले यदि मनुष्य अपने भीतर की अशांति को शांत कर ले, तो जीवन में वास्तविक सुख, शांति और आनंद का अनुभव किया जा सकता है।
प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल से प्राप्त जानकारी।
औरंगाबाद से संकलन — अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो.: 9929747312







