ब्रह्मचर्याणुव्रत आत्मा में लीन होने की साधना है : मुनि श्री योगसागर जी महाराज

धर्म

ब्रह्मचर्याणुव्रत आत्मा में लीन होने की साधना है : मुनि श्री योगसागर जी महाराज
कोटा, 02 अक्टूबर 2026।

शुक्रवार, आश्विन कृष्ण षष्ठी-सप्तमी, महात्मा गांधी जयंती एवं मुक्तावली व्रत के पावन अवसर पर श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार प्रवचन श्रृंखला के श्लोक क्रमांक 59-60 के माध्यम से ब्रह्मचर्याणुव्रत के स्वरूप एवं अतिचारों पर धर्मसभा को संबोधित किया

 

 

मुनि श्री ने कहा कि ब्रह्म का अर्थ आत्मा है और आत्मा में लीन होने की दिशा में निरंतर आगे बढ़ना ही वास्तविक ब्रह्मचर्य है। पाप के भय से परस्त्री के प्रति स्वयं गमन न करना तथा दूसरों को भी ऐसे आचरण के लिए प्रेरित न करना, परस्त्री-त्याग एवं स्वदार-संतोष ब्रह्मचर्याणुव्रत की आधारभूत भावना है।

उन्होंने कहा कि ब्रह्मचर्य केवल बाहरी आचरण का विषय नहीं, बल्कि अंतरंग परिणामों की निर्मलता और आत्मा की ओर लौटने की साधना है। जब मनुष्य अपने भावों को विषय-वासनाओं से हटाकर आत्मस्वरूप में रमण की ओर ले जाता है, तभी ब्रह्मचर्य की वास्तविक अनुभूति का मार्ग प्रशस्त होता है।
शील की साधना से आत्मशुद्धि की दिशा
मुनि श्री ने कहा कि षट्खण्डागम जैसे महान ग्रंथों में दान, पूजा, शील और उपवास को सम्यक श्रावक एवं सम्यक दृष्टि के लक्षणों के रूप में बताया गया है। पंचम गुणस्थानवर्ती श्रावक के शील की महिमा सभी धर्मग्रंथों में प्रतिपादित की गई है।


ब्रह्मचर्य की साधना में स्पर्शनेंद्रिय एवं कामेंद्रिय प्रमुख बाधक कारण बन सकते हैं। इसलिए साधक को विषय-वासनाओं पर विजय प्राप्त करते हुए अपने अंतरंग परिणामों को निरंतर विशुद्ध करते रहना चाहिए। जागरूकता के बिना संयम की साधना स्थिर नहीं रह सकती।
आत्मा में रमण ही ब्रह्मचर्य की वास्तविक अनुभूति
उन्होंने कहा कि चारित्र मोहनीय कर्म की संज्वलन कषायों को जीतने की दिशा में बढ़ते हुए निर्ग्रंथ मुनि हों अथवा पंचम गुणस्थानवर्ती श्रावक—प्रत्येक साधक कर्मों से मुक्त होने का पुरुषार्थ करता है।
जब मनुष्य के भाव ब्रह्म अर्थात अपनी आत्मा में रमण करने लगते हैं, तभी ब्रह्मचर्य की वास्तविक अनुभूति प्रारंभ होती है। मन, वचन और काय के परिणामों को निरंतर शुद्ध करते रहने से साधक आत्मानुभूति की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
मुनि श्री ने साधना की क्रमिक प्रक्रिया बताते हुए कहा कि पहले काया को संयमित करना, फिर वचन को और अंततः मन को संयमित करना आवश्यक है। बाहरी संयम धीरे-धीरे अंतरंग संयम का आधार बनता है।
विषय-वासनाओं से सावधान रहना ही साधक की जागरूकता
मुनि श्री ने कहा कि प्रत्येक समय विषय-वासनाओं, राग-द्वेष और कषायों से सावधान रहना ही जागरूक साधक की पहचान है। महापुराण में गर्भ से लेकर मृत्यु तक के विभिन्न संस्कारों का वर्णन करते हुए जीवन में संस्कार एवं संयम के महत्व को स्पष्ट किया गया है।
उन्होंने बताया कि पंचम गुणस्थान में अनन्तानुबंधी एवं अप्रत्याख्यान कषायों का उदय नहीं होता और साधक असंख्यात गुणों की निर्जरा का पुरुषार्थ करता है। इसलिए श्रावक जीवन में भी संयम, शील और आत्मजागृति का विशेष महत्व है।
अतिचार से बचना ही व्रत की निर्मलता की रक्षा
ब्रह्मचर्य व्रत के अतिचारों की चर्चा करते हुए मुनि श्री ने बताया कि अन्य का विवाह कराना, अनंग क्रीड़ा, विटत्व, विपुल तृषा आदि भाव ब्रह्मचर्याणुव्रत के अतिचारों में बताए गए हैं। अतिचार धीरे-धीरे अनाचार और अंततः व्रतभंग का कारण बन सकता है। इसलिए व्रती को अपने आचरण के प्रति हर क्षण सजग और सावधान रहना चाहिए।
उन्होंने कहा कि साधना, आचार-शास्त्र का बार-बार अध्ययन और स्वाध्याय ही व्रतों को निर्दोष रूप से पालन करने की शक्ति प्रदान करते हैं। जब मन शांत होकर विकल्पों से मुक्त होने लगे और ध्यान में स्थिरता प्राप्त करे, तभी साधक व्रतों की चंचलता से ऊपर उठकर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने आह्वान किया कि आत्मकल्याण के पथ पर चलने वाले प्रत्येक साधक को निरंतर जागृत रहकर अपनी साधना को उत्कृष्ट बनाते जाना चाहिए। ब्रह्मचर्य बाहरी नियंत्रण मात्र नहीं, बल्कि भीतर उठने वाले विकारों पर विजय प्राप्त कर आत्मा के निकट पहुंचने का मार्ग है।
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🌺 आज के प्रमुख पुण्यार्जक
विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से किया पुण्यार्जन
प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्रद्धालु परिवारों द्वारा भक्तिभावपूर्वक किया गया।
श्रीमती चंदा जी, अक्षरा जी एवं समस्त जैन परिवार, छिंदवाड़ा द्वारा कलश स्थापना का पुण्यार्जन किया गया। वहीं दीपेश जी, पदमा जी एवं समस्त परिवार, आंवा वाले परिवार द्वारा भी धार्मिक अनुष्ठान में पुण्यार्जन किया गया।
श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन राजेंद्र जी, हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार, तथा श्रीमती चंदा जी, सलोनी एवं विकास जैन, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश द्वारा भक्तिभावपूर्वक किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रद्धालुओं द्वारा भक्तिभावपूर्वक किया गया।
श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ समस्त परिवार, दादाबाड़ी, कोटा को प्राप्त हुआ।
श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य विमलचंद जी एवं आशा दीदी परिवार को प्राप्त हुआ।
इस अवसर पर मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
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🪷 गुरुवाणी का अमृत संदेश
ब्रह्म का अर्थ आत्मा है, आत्मा में रमण की दिशा में बढ़ना ही वास्तविक ब्रह्मचर्य
मन, वचन और काय के परिणामों की शुद्धि से प्रारंभ होती है आत्मानुभूति की यात्रा
विषय-वासनाओं, राग-द्वेष और कषायों पर विजय ही ब्रह्मचर्य साधना का मूल उद्देश्य
काया से वचन और वचन से मन का संयम—साधना की क्रमिक प्रक्रिया
व्रतों की निर्दोष पालना के लिए आचार-शास्त्र का अध्ययन, स्वाध्याय और निरंतर जागरूकता आवश्यक
आज के प्रवचन का सार
ब्रह्मचर्य बाहरी नियंत्रण मात्र नहीं, बल्कि आत्मा में लीन होने की साधना है। विषय-वासनाओं, राग-द्वेष और कषायों से सावधान रहते हुए मन, वचन और काय के परिणामों को निरंतर शुद्ध करना ही इसकी वास्तविक दिशा है। काया का संयम, वाणी का संयम और अंततः मन का संयम साधक को आत्मानुभूति के निकट ले जाता है। अतिचारों से बचने के लिए निरंतर जागरूकता, आचार-शास्त्र का अध्ययन और स्वाध्याय आवश्यक है। जब मन विकल्पों से मुक्त होकर आत्मा में रमण करने लगे, तभी ब्रह्मचर्य की साधना अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करती है।

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट

 

 

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