विनम्रता और सद्गुणों से ही संभव है आत्मकल्याण : आचार्य श्री सुनीलसागरजी महाराज* 

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*विनम्रता और सद्गुणों से ही संभव है आत्मकल्याण : आचार्य श्री सुनीलसागरजी महाराज*

 

नेमी नगर जैन कॉलोनी, इंदौर।

गुरदेव ने अपने प्रवचन में कहा अपने लहजे में नम्रता बनाए रखें, क्योंकि यह संसार एक मेहमानखाना है। यहाँ व्यक्ति अमीर तो हो सकता है, लेकिन अमर नहीं। जीवन की इसी सच्चाई को समझाते हुए सद्गुणों को अपनाने, अवगुणों को त्यागने और आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश दिया गया।

 

विचार व्यक्त करते हुए कहा गया कि मनुष्य को अपने भीतर झाँककर अपने गुणों को निखारना चाहिए तथा सद्गुणों में वृद्धि करनी चाहिए। अवगुण व्यक्ति को अधोलोक की ओर ले जाते हैं, जबकि सद्गुण ऊर्ध्वलोक की यात्रा का मार्ग प्रशस्त करते हैं। जब आत्मा में अनंत गुण प्रकट हो जाते हैं, तब आत्मा परमात्मा स्वरूप को प्राप्त करती है।

 

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से राग-द्वेष और संकल्प-विकल्प के परिणामों को संसार में बंधे रहने का कारण बताया गया। जब तक मनुष्य इन भावों से मुक्त नहीं होता, तब तक उसकी संसार यात्रा जारी रहती है।

 

यह भी बताया गया कि जैसे-जैसे व्यक्ति अपने भीतर के अवगुणों को दूर कर सद्गुणों को अपनाता है, वैसे-वैसे उसके व्यक्तित्व में निखार आता है। उसके विचारों, वाणी और व्यवहार में भी सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगता है।

 

संदेश दिया गया कि जीवन में विनम्रता, सदाचार और आत्मचिंतन को स्थान देकर व्यक्ति न केवल अपने व्यक्तित्व को बेहतर बना सकता है, बल्कि आत्मकल्याण के मार्ग पर भी आगे बढ़ सकता है।

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