सॉफ्टवेयर इंजीनियर अक्षत जैन ने सात दिन निर्जल उपवास और तीन दिन एकासन कर की तप आराधना
मुनिश्री वीरसागर महाराज की सन्निधि में दशलक्षण पर्व पर युवा ने नियम संयम के साथ रहते हुए की तप साधना
रामगंजमंडी।
संतों की सन्निधि और धर्म की प्रेरणा व्यक्ति के जीवन में ऐसे संस्कारों का संचार करती है, जो स्वयं के साथ समाज के लिए भी प्रेरणास्रोत बन जाते हैं। ऐसा ही अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है मोड़क निवासी मनोज मीनू दुगेरिया के पुत्र अक्षत जैन दुर्गेरिया ने।
पुणे की एक कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कार्यरत अक्षत जैन ने दशलक्षण पर्व के दौरान अपनी व्यस्तताओं और भौतिक जीवन की भागदौड़ को पीछे छोड़ते हुए बैंगलोर में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज से दीक्षित शिष्य एवम आचार्य श्री 108 समयसागर महाराज के आज्ञानुवृति शिष्य निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 वीरसागर महाराज की सन्निधि में चल रहे श्रावक संस्कार शिविर में सहभागिता की। उन्होंने शिविर में साधना के साथ सक्रिय रूप से सहयोग भी किया।

अक्षत जैन ने इस दौरान लगातार सात दिनों तक अन्न-जल का त्याग कर निर्जल उपवास किया। इसके साथ ही तीन दिनों तक एकासन की साधना भी की। इस प्रकार उन्होंने दशलक्षण पर्व में कुल दस दिनों तक कठोर तप-साधना करते हुए आत्मसंयम का परिचय दिया।
प्रचंड गर्मी के बीच सात दिनों तक निर्जल उपवास करना और तीन दिनों तक एकासन की साधना करना दृढ़ संकल्प, आत्मबल और धर्म के प्रति समर्पण का परिचायक है। खास बात यह है कि युवा अवस्था में आधुनिक क्षेत्र में कार्यरत होते हुए भी अक्षत ने धर्म और संस्कारों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाया।
आज जब युवा पीढ़ी आधुनिकता और भौतिक जीवन की भागदौड़ में व्यस्त है, ऐसे समय में एक युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर का संत सान्निध्य में रहकर तप, संयम और साधना के मार्ग पर आगे बढ़ना निश्चित रूप से प्रेरणादायी है।






अक्षत जैन दुर्गेरिया की इस उत्कृष्ट तप आराधना पर अनंत-अनंत अनुमोदना।


