उत्तम क्षमावाणी पर्व : क्षमा से निर्मल होता है मन जमनालाल जैन हपावत
पर्युषण और दशलक्षण पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों का अवसर नहीं, बल्कि स्वयं को भीतर से देखने, अपनी गलतियों को स्वीकार करने और जीवन को अधिक निर्मल बनाने का संदेश देने वाले पावन पर्व हैं। इन्हीं में उत्तम क्षमा धर्म हमें सिखाता है कि मन में किसी के प्रति क्रोध, वैर या कटुता रखने के बजाय प्रेम, करुणा और क्षमा का भाव रखें।
मनुष्य जीवन में जाने-अनजाने अनेक भूलें हो जाती हैं। कभी हमारे शब्द किसी को ठेस पहुंचा देते हैं, कभी व्यवहार से किसी का मन दुख जाता है और कभी परिस्थितियों के कारण हम किसी के साथ वैसा व्यवहार नहीं कर पाते, जैसा करना चाहिए था। कई बार गलती छोटी होती है, लेकिन मन पर उसका बोझ बड़ा हो जाता है।
उत्तम क्षमा हमें उस बोझ से मुक्त होने का मार्ग दिखाती है।
क्षमा मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि अपने अहंकार को पीछे छोड़कर स्वयं को स्वीकार करने का साहस है। और किसी को क्षमा कर देना उससे भी बड़ा मानवीय गुण है। जब हम सच्चे मन से क्षमा करते हैं, तब केवल सामने वाले को ही नहीं, बल्कि अपने मन को भी शांति प्रदान करते हैं।
क्षमावाणी पर्व हमें यह अवसर देता है कि हम अपने मन की गांठें खोलें, पुराने गिले-शिकवे भूलें और रिश्तों में प्रेम एवं विश्वास की नई शुरुआत करें।
मेरी ओर से क्षमायाचना
इस पावन क्षमावाणी पर्व पर मैं उन सभी आत्मीयजनों, मित्रों, समाजबंधुओं और परिचितों से हृदय से क्षमा मांगता हूं, जिन्हें मेरे किसी शब्द, व्यवहार, कार्य या अनजाने में हुई किसी भूल से कभी भी ठेस पहुंची हो।
यदि कभी मेरी वाणी से किसी का मन दुखा हो, मेरे व्यवहार से किसी को कष्ट हुआ हो, किसी बात से किसी को असम्मान का अनुभव हुआ हो अथवा जाने-अनजाने मेरी कोई गलती किसी के लिए पीड़ा का कारण बनी हो, तो मैं उसके लिए हृदय की गहराइयों से क्षमाप्रार्थी हूं।
मेरा उद्देश्य कभी किसी को दुख पहुंचाना नहीं रहा। फिर भी मनुष्य होने के नाते यदि कोई भूल हुई है तो आज इस पावन अवसर पर मैं उसे स्वीकार करते हुए आप सभी से क्षमा चाहता हूं।
मैं भी अपने मन से सभी के प्रति हुए किसी भी गिले-शिकवे, शिकायत और कटुता को समाप्त करते हुए सभी को हृदय से क्षमा करता हूं।
आइए, क्षमावाणी के इस पावन पर्व पर हम केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने मन से एक-दूसरे को क्षमा करें और प्रेम, मैत्री, सद्भाव एवं आत्मीयता के साथ जीवन को आगे बढ़ाएं।
मिच्छामि दुक्कडम्।
आप सभी से एवं ग्लोबल महासभा के लिए मेरे द्वारा फोन पर किसी को व्यवधान या परेशानी हुई हो तो मन, वचन और काय से एवम जाने-अनजाने हुई समस्त भूलों के लिए करबद्ध क्षमायाचना करता हूं।








मिच्छामि दुक्कडम्।
जमनालाल जैन हपावत मुंबई
संस्थापक ट्रस्टी एवम राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री दिगंबर जैन ग्लोबल महासभा
