जैनियों के क्षमापना दिवस को मिले अंतरराष्ट्रीय पहचान, सितंबर के चौथे रविवार को मनाया जाए ‘भूलो-क्षमा करो दिवस’
डॉ. कल्याण गंगवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री को पत्र भेजकर रखा प्रस्ताव, क्षमा, अहिंसा और शांति का संदेश दुनिया तक पहुंचाने की पहल
पुणे।
शाकाहार एवं अहिंसा के प्रचार-प्रसार में सक्रिय डॉ. कल्याण गंगवाल, पुणे ने जैन धर्म की क्षमापना परंपरा को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में पहल की है। उन्होंने 15 अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं केंद्रीय गृहमंत्री को पत्र लिखकर जैनियों के क्षमापना दिवस की भावना से प्रेरित “भूलो-क्षमा करो दिवस (Forget-Forgive Day)” को प्रत्येक वर्ष सितंबर माह के चौथे रविवार को मनाए जाने का प्रस्ताव रखा है।
डॉ. गंगवाल ने अपने पत्र में कहा कि वर्तमान समय में दुनिया हिंसा, आतंकवाद, भय, घृणा, युद्ध, संघर्ष, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। ऐसे दौर में ऐसा दिवस मनाया जाना उपयोगी हो सकता है, जो लोगों को पुरानी कटुता और वैमनस्य भूलने, एक-दूसरे से क्षमा मांगने, क्षमा करने तथा आपसी मेल-मिलाप और शांति की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे।
जैन परंपरा से जुड़ा है क्षमा का सार्वभौमिक संदेश
पत्र में डॉ. गंगवाल ने जैन धर्म की क्षमापना, “मिच्छामि दुक्कड़म्” और संवत्सरी की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि पर्युषण महापर्व के समापन पर व्यक्ति आत्मचिंतन करता है, अपनी भूलों के लिए क्षमा मांगता है और दूसरों को भी क्षमा करता है। क्षमा और अहिंसा के ये मूल्य भगवान महावीर के उपदेशों से भी गहराई से जुड़े हैं।
उन्होंने कहा कि “भूलो-क्षमा करो दिवस” के माध्यम से पुरानी कटुता और मनमुटाव को समाप्त करने, आपसी सौहार्द बढ़ाने तथा अहिंसा, करुणा और शांति के मूल्यों को मजबूत करने का संदेश पूरी दुनिया तक पहुंचाया जा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र के मंच तक पहुंचाने का प्रस्ताव
डॉ. गंगवाल ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि इस प्रस्ताव पर राष्ट्रीय स्तर पर विचार करने के साथ ही इसे उपयुक्त अंतरराष्ट्रीय मंचों, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र संघ, के समक्ष आगे बढ़ाने की दिशा में भी प्रयास किया जाए, ताकि “भूलो और क्षमा करो” का संदेश भारत से निकलकर विश्वभर में पहुंचे।
पत्र में डॉ. गंगवाल के साथ जीवन प्रकाश मदवैया, भोपाल का भी उल्लेख है। प्रस्ताव का मूल संदेश है—
“भूलें। क्षमा करें। मेल-मिलाप करें। शांति से जिएं।”
डॉ. कल्याण गंगवाल ने पत्र का समापन “मिच्छामि दुक्कड़म्” के साथ करते हुए क्षमा और शांति की इस भारतीय परंपरा को व्यापक वैश्विक स्वरूप देने की अपेक्षा व्यक्त की है।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

