पर्वराज पर्युषण का नवां चरण : उत्तम आकिंचन धर्म आचार्य प्रसन्न सागर बोले—जो दिख रहा है, वह सब छूटने वाला है; स्वयं को समझना ही उत्तम आकिंचन

धर्म

पर्वराज पर्युषण का नवां चरण : उत्तम आकिंचन धर्म
आचार्य प्रसन्न सागर बोले—जो दिख रहा है, वह सब छूटने वाला है; स्वयं को समझना ही उत्तम आकिंचन

सोनकच्छ

। पर्वराज पर्युषण महापर्व के नवें चरण उत्तम आकिंचन धर्म के अवसर पर पुष्पगिरी तीर्थ सोनकच्छ में धर्मसभा का आयोजन हुआ। परम पूज्य पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर महाराज के सानिध्य में वर्षायोग हेतु विराजमान व्रत चक्रवर्ती पट्ट विभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पियूष सागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम संपन्न हो रहे हैं।

 

 

नवम दिवस की धर्मसभा को संबोधित करते हुए अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने उत्तम आकिंचन धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि “जो दिख रहा है, वह सब छूटने वाला है।” राजा हो या रंक, संत हो या फकीर, संसार में जन्म लेने वाले प्रत्येक जीव को एक दिन मृत्यु का सामना करना है। मनुष्य इस संसार में खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही चला जाता है। जीवनभर जो कुछ जोड़ा जाता है, वह सब यहीं छूट जाता है।

 

 

आचार्य श्री ने कहा कि “जिसने कहा मेरा—वो मरा, जिसने कहा तेरा—वो तरा।” मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या उसका परिग्रह और ममत्व है। किसी के पास कमी कुछ भी नहीं है, लेकिन कड़वा सच यह भी है कि पूरा किसी के पास कुछ भी नहीं है। मनुष्य जिस सुख को प्राप्त करने के लिए अपना पूरा जीवन लगा देता है, वह अक्सर अप्राप्त वस्तुओं की चाह से जुड़ा होता है।

 

उन्होंने कहा कि दूसरों को समझाना सरल है, लेकिन स्वयं को समझना और जानना सबसे कठिन कार्य है। ब्रह्मांड में जो सुख स्वयं को समझने में है, वह दूसरों को समझाने में नहीं है। स्वयं को समझना ही उत्तम आकिंचन धर्म की दिशा है।

 

अपने भीतर के ब्रह्मांड को जानने की जरूरत
आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि आज मनुष्य दूसरों को समझाने में जितना माहिर हो गया है, उतना स्वयं को समझने में समय नहीं दे पा रहा है। यही जीवन का सबसे बड़ा दुःख है। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक अलग ब्रह्मांड है, लेकिन अधिकांश लोग अपने ही भीतर के इस संसार से अनजान और अपरिचित हैं।
उन्होंने कहा कि भीतर के ब्रह्मांड का अपना एक अलग सौंदर्य है। यदि मनुष्य एक बार उस आंतरिक सौंदर्य को पहचान ले, तो बाहर के आकर्षण फीके और नीरस लगने लगेंगे। बाहर कहीं हरियाली है तो कहीं ऊबड़-खाबड़ रास्ते और कहीं इच्छाओं के पहाड़ खड़े हैं। उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के भीतर के संसार का विस्तार भी अलग-अलग है।

 

 

आचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति स्वयं को जानने और समझने के लिए कितना समय देता है, यह पूरी तरह उसी पर निर्भर करता है। जीवन में व्यक्ति कितना भी महत्वपूर्ण क्यों न हो, यदि उसके पास अपने भीतर के ब्रह्मांड को देखने, जानने और समझने का समय नहीं है, तो वह अपने ही वास्तविक स्वरूप के सौंदर्य से अपरिचित रह जाएगा।
त्याग और आत्मचिंतन से मिलता है जीवन का मर्म
उन्होंने कहा कि जीवन के वास्तविक मर्म को जानने और समझने के लिए हर परिस्थिति में निज चेतना का ध्यान रखना आवश्यक है।

 

 

एकांत में विचार करना, मौन को अपनाना, इच्छाओं को शांत करना, मन में निर्लोभिता रखना और शिशु जैसी निश्छलता बनाए रखना ही उत्तम आकिंचन धर्म का मार्ग है।
आचार्य श्री ने कहा कि उत्तम आकिंचन का अर्थ है—जीवन में कितना भी जोड़ लो, साथ कुछ भी नहीं जाएगा। साथ जाएगा तो केवल धर्म, सत्संग, पुण्य, सेवा-सत्कार और परोपकार। इसलिए मनुष्य को बाहरी संग्रह के बजाय आत्मा के गुणों का संग्रह करना चाहिए।
धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री के आध्यात्मिक संदेश को ध्यानपूर्वक सुना और आत्मचिंतन के साथ उत्तम आकिंचन धर्म की आराधना की।
प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पियूष कासलीवाल, औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी9929747312

 

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