24 प्रकार के परिग्रह का त्याग करना, में अकेला हूं मेरा कुछ नहीं है यही आकिंचन धर्म का संदेश है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

धर्म

24 प्रकार के परिग्रह का त्याग करना, में अकेला हूं मेरा कुछ नहीं है यही आकिंचन धर्म का संदेश है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

सीकर

राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सहित दंग की नसिया विराजित है। प्रातः कालीन श्री जी के पंचामृत अभिषेक के बाद आचार्य श्री धर्म सागर सभागृह में आचार्य श्री का दश लक्षण पर्व के 9 दिन उत्तम आकिंचन्य धर्म पर उपदेश हुआ। आचार्य श्री ने कहा कि 9 दिवस में धर्म से आपने क्या पाया क्या पाने का प्रयास किया ? धर्म मोक्ष प्रदान करता है। धर्म की 10 सीढ़ी में आज 9 वी सीढ़ी आकिंचन धर्म है मेरा कुछ भी नहीं है सभी प्रकार के परिग्रह से निवृत होना अकिंचन धर्म है। 9 का अंक अक्षय अखंड अंक है पिछले 10 दिनों में प्रथम दिवस से क्रोध ,मान ,मायाचारी, लोभ का त्याग कर संयम त्याग तप को धारण किया।चार कषाय पांच पाप पांच इंद्रियविषय भोग आत्मा का अहित करते हैं इनसे दूर रहकर इनका त्याग करना चाहिए।विषयभोग आत्मा के स्वरूप को ढकते हैं क्रोध प्रीति का नाश करता है, मान मृदुता का नाश, मायाचारी सरलता का,लोभ विनाश करता है। तप यह विकारी भाव को दूर करता है। 14 प्रकार के अंतरंग और 10 प्रकार के बहिरंग परिग्रहों का मुनिराज त्याग करते हैं।

डॉ राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि अभी तक आपने 9 ग्रह सुने होंगे किन्तु जैन धर्म अनुसार 10 ग्रह परिग्रह है परिग्रहों से दुख ओर कष्ट मिलता हैं मेरा कुछ नहीं है यही भाव आना आकिंचन्य धर्म है संसार में भगवान, सम्यक दर्शन, ज्ञान ,सम्यक चारित्र तप संयम ही शरण भूत है। दोपहर को तत्वार्थ सूत्र की विवेचना आचार्य श्री द्वारा की जा रही है शाम को श्रीजी और आचार्य श्री की आरती के पश्चात सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं राजेश पंचोलिया इंदौर

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