त्याग ही आत्मशुद्धि का मार्ग, …..ब्रह्मचारी प्रसन्न भैया
वैराग्य मेंहदी उत्सव के साथ निकलेगा जिन प्रभावना जुलूस ….25 अक्टूबर को होगी जैनेश्वरी दीक्षा
सोनकच्छ।
पर्युषण महापर्व के आठवें दिन श्री महावीर जिनालय में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में ब्रह्मचारी प्रसन्न भैया जी ने त्याग धर्म का महत्व बताते हुए कहा कि “त्यजति इति त्यागः” अर्थात ‘त्यज्’ धातु से त्याग शब्द बना है। अप्राप्त भोगों की इच्छा न करना तथा प्राप्त भोगों से विमुख हो जाना ही त्याग है।त्याग ही आत्मशुद्धि का मार्ग है
उन्होंने कहा कि सामान्य रूप से जीवन के हर क्षेत्र में त्याग की आवश्यकता होती है। रोगों से मुक्ति, स्वास्थ्य की प्राप्ति, संयमित जीवन जीने और यहां तक कि जीवन के अंतिम पड़ाव तक त्याग का महत्व है। पर पदार्थ का ग्रहण अपराध है और इसी अपराध से मुक्त होने का मार्ग त्याग है।
इस अवसर पर जैन समाज के प्रवक्ता रोमिल जैन ने बताया कि समाज के लिए यह गौरव का विषय है कि श्रमणाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज के शिष्य ब्रह्मचारी प्रसन्न भैया जी छत्रपति संभाजी नगर औरंगाबाद आगामी 25 अक्टूबर को जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण करने जा रहे हैं। दीक्षा की तैयारियों के तहत समाज में विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
उन्होंने बताया कि 24 सितंबर गुरुवार को समाज के मांगलिक भवन में रात्रि 8 बजे से ‘वैराग्य मेहंदी उत्सव’ आयोजित होगा। वहीं 26 सितंबर शनिवार को प्रातः 8 बजे दीक्षा वर घोड़ा एवं जिनधर्म प्रभावना जुलूस निकाला जाएगा। यह आयोजन सांसारिक जीवन का त्याग कर संयम और साधना के मार्ग पर बढ़ने वाले प्रसन्न भैया जी के वैराग्य भाव को समर्पित रहेगा।

