सबसे उत्तम दान है आहार दान : आर्यिका श्री सुप्रज्ञमति माताजी
“उपवास करना आसान, लेकिन राग-द्वेष और कषायों का त्याग करना कठिन”
बड़वानी।
बड़वानी में विराजित परम पूज्य गुरुदेव चतुर्थ पट्टाचार्य 108 आचार्य श्री सुनीलसागर जी महाराज की शिष्या 105 आर्यिका श्री सुप्रज्ञमति माताजी ने त्याग के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जीवन में त्याग का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। त्याग अनेक प्रकार का होता है, लेकिन वास्तविक त्याग वह है, जिसमें मनुष्य अपने भीतर के राग-द्वेष, मोह और कषायों को छोड़ने का प्रयास करे।
आर्यिका माताजी ने कहा कि उपवास करना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन अपने राग-द्वेष और कलुषित परिणामों का त्याग करना बहुत कठिन है। संसारी जीव आठ कर्मों से बंधा हुआ है और इन कर्मों से मुक्त होने के लिए सबसे पहले मिथ्यात्व का त्याग आवश्यक है। संयममय जीवन के लिए उत्कृष्ट चर्या का पालन करना होगा और संयम प्राप्त करने के लिए प्रमाद का त्याग करना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि मनुष्य कितना ही धन कमा ले, लेकिन जब पापकर्म का उदय आता है तो संचित धन-संपत्ति भी क्षणभर में मिट्टी बन सकती है। हाल ही में नेपाल में हुई त्रासदी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसी घटनाएं हमें जीवन की अनिश्चितता का बोध कराती हैं। मनुष्य को धन-संपत्ति के साथ-साथ अपने भीतर के मोह को भी कम करने का प्रयास करना चाहिए।
मोह का त्याग होगा तो मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ेंगे
आर्यिका माताजी ने कहा कि जब तक शरीर और सांसारिक वस्तुओं के प्रति मोह कम नहीं होगा, तब तक मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ना कठिन है। जैसे-जैसे मोह का त्याग होगा, वैसे-वैसे प्रमाद भी स्वतः कम होने लगेगा। मोह के रहते त्याग के भाव जागृत नहीं होते और तप की भावना भी दृढ़ नहीं हो पाती।
उन्होंने श्रद्धालुओं से क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे कषायों के त्याग का आह्वान करते हुए कहा कि अर्जित धन को चार प्रकार के दान में लगाना चाहिए। इससे इस भव के साथ परभव भी सुधर सकता है। उन्होंने कहा कि दान में आहार दान को अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि आहार दान में अन्य प्रकार के दान का भाव भी समाहित हो सकता है।
माताजी ने कहा कि ज्ञान केवल पुस्तकों को पढ़ लेने से नहीं, बल्कि साधना और आत्मानुभूति के बल पर विकसित होता है। मोह के क्षय और आत्मसाधना से ज्ञान का वास्तविक प्रकाश प्रकट होता है।
जब तपस्वी सम्राट ने साधुओं को समझाया त्याग का अर्थ
त्याग की महत्ता समझाते हुए आर्यिका माताजी ने तपस्वी सम्राट आचार्य श्री सन्मतिसागर जी महाराज के बनारस चातुर्मास का प्रसंग सुनाया।
उन्होंने बताया कि ठंड के मौसम में एक बार आचार्य श्री ने संघ के मुनिराजों से चलने के लिए कहा। कुछ मुनिराजों ने थोड़ी देर बाद चलने का निवेदन किया। इसका कारण यह था कि आचार्य श्री अधिक उपवास करते थे और नदी किनारे जाने में कड़ाके की ठंड का सामना करना पड़ता था।
जब सभी साधु नदी किनारे पहुंचे तो वहां कुछ सब्जी विक्रेता नदी के पानी में सब्जियों से मिट्टी साफ कर रहे थे। वे भीषण ठंड में पानी में उतरकर अपने शरीर और कपड़ों को गीला कर मेहनत कर रहे थे।
आचार्य श्री ने मुनिराजों को उनकी ओर संकेत करते हुए कहा कि देखो, ये लोग दो रोटी की व्यवस्था और जीवन-यापन के लिए इतनी भीषण ठंड में पानी में उतरकर परिश्रम कर रहे हैं। तुम्हें तो श्रावक श्रद्धा से गरम भोजन उपलब्ध करा देगा। तुम तो मोक्ष मार्ग के साधक हो। इसलिए ठंड, गर्मी और वर्षा जैसी परिस्थितियों को सहन करते हुए त्याग और संयम के मार्ग पर आगे बढ़ना होगा।
यह प्रसंग त्याग, तप और सहनशीलता की प्रेरणा देने वाला है।
दिनभर धर्ममय रहा वातावरण
बड़वानी में धार्मिक कार्यक्रमों की श्रृंखला के तहत प्रातःकाल भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, नित्य नियम पूजन, सोलह कारण जी, दस लक्षण जी, रत्नत्रय एवं तीर्थंकर भगवान की पूजन तथा आरती हुई।
दोपहर में तत्त्वार्थ सूत्र का वाचन, जबकि शाम को प्रतिक्रमण, ध्यान, आरती एवं प्रवचन का आयोजन हुआ। इसके साथ ही धार्मिक प्रतियोगिता भी आयोजित की गई, जिसमें श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
दीपक जैन, प्रधान धामनोद से प्राप्त जानकारी।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी
मो. 992947312
