उत्तम त्याग धर्म : राग-द्वेष और परिग्रह का त्याग ही सच्ची आत्मसाधना
विभाव और परभाव से विरक्ति ही आत्मस्वभाव की ओर ले जाती है : मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज
दान पाप के ब्याज को चुकाता है, जबकि त्याग पाप के मूल को समाप्त करने की दिशा दिखाता है
अनेक शिविरार्थियों ने दस व पांच उपवास की साधना की
कोटा, 23 सितम्बर।
दशलक्षण महापर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म के पावन अवसर पर श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में आयोजित धर्मसभा में ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने त्याग धर्म की आध्यात्मिक महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि हमें अपने धर्म और आत्मस्वभाव को प्राप्त करना है तो विभाव तथा परभाव रूप विषयों का त्याग करना होगा। साधक तप और संयम के माध्यम से मोह, राग, द्वेष तथा परिग्रह से उत्पन्न बाहरी पदार्थों के आकर्षण को छोड़कर आत्मस्वरूप की ओर बढ़ता है। संसार के बंधनों से मुक्त होने के लिए त्याग आवश्यक है।
मुनिश्री ने कहा कि “दान पाप के ब्याज को चुकाता है, जबकि त्याग पाप के मूल को चुकाता है।” पाप लोहे की बेड़ी है और पुण्य सोने की बेड़ी। इसलिए जीवन में पुण्य के साथ-साथ पाप कर्मों के त्याग की दिशा में भी सजग रहना चाहिए। उदारता, सेवा, दान और समर्पण में आत्मिक मिठास है, लेकिन त्याग विवेकपूर्वक होना चाहिए तथा फल की अपेक्षा से रहित होकर धर्माचरण करना चाहिए।

वस्तुओं का संग्रह संसार की प्रवृत्ति, त्याग आत्मस्वभाव की ओर बढ़ने का मार्ग
मुनिश्री ने कहा कि संसार में मनुष्य का स्वभाव वस्तुओं को ग्रहण करने और उनमें ममत्व रखने का बन गया है, जबकि त्याग धर्म इस प्रवृत्ति को बदलकर आत्मस्वभाव की ओर ले जाता है। राग-द्वेष से ऊपर उठना ही वास्तविक त्याग है। प्रभु और गुरु के उपदेश से किया गया त्याग जीवन को नई दिशा और दशा प्रदान करता है।

उन्होंने कहा कि त्याग केवल वस्तुओं को छोड़ने तक सीमित नहीं है। ममत्व, आसक्ति, राग-द्वेष और विषय-वासनाओं का त्याग ही त्याग धर्म की वास्तविक साधना है। जब मनुष्य भीतर से परिग्रह और आसक्ति को छोड़ता है, तभी आत्मशुद्धि की दिशा में उसके कदम आगे बढ़ते हैं।

त्याग से संवर और निर्जरा की दिशा होती प्रशस्त
इससे पूर्व मुनि श्री 108 प्रणवसागर जी महाराज ने कहा कि व्रत पालन के लिए होते हैं। महाव्रती निरंतर व्रतों का पालन करते हैं, जबकि श्रावक दशलक्षण महापर्व के माध्यम से उस जीवन
-पद्धति को जीने का अभ्यास करता है।
उन्होंने कहा कि त्याग स्वयं के निमित्त से और दान पर के निमित्त से होता है। वस्तुओं के प्रति ममत्व छोड़ना, राग-द्वेष से ऊपर उठना और आत्मकल्याण की ओर बढ़ना ही उत्तम त्याग है।
मुनिश्री ने कहा कि त्याग से संवर और निर्जरा की दिशा प्रशस्त होती है। दान में हर्ष का भाव पुण्यबंध का कारण बनता है, जबकि त्याग साधक को आत्मशुद्धि की ओर आगे बढ़ाता है। जिसने त्याग को जीवन में अपनाया, उसने अपने भीतर आत्मोन्नति का मार्ग प्रशस्त किया। यही उत्तम त्याग धर्म का सार और संदेश है।
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208 शिविरार्थियों ने की अनुशासित धर्म-साधना
एकरूप वेशभूषा, शुद्ध आहार, शांतिधारा, दशलक्षण विधान, भक्तामर विधान, तत्त्वार्थ सूत्र, जिज्ञासा-समाधान एवं महाआरती में भक्तिभाव से सहभागिता
शिविर निदेशक श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि दशलक्षण आध्यात्मिक योग साधना एवं संस्कार शिविर में 208 शिविरार्थियों ने विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भक्तिभाव से सहभागिता की। महिलाओं ने एक समान साड़ी तथा पुरुषों ने सफेद धोती-दुपट्टा धारण कर धार्मिक एकरूपता एवं अनुशासन का परिचय दिया।
शिविरार्थियों ने शांतिधारा, दशलक्षण विधान, भक्तामर विधान, तत्त्वार्थ सूत्र एवं जिज्ञासा-समाधान सहित विभिन्न धार्मिक गतिविधियों में सहभागिता की। शिविर के दौरान शिविरार्थियों ने एक समय शुद्ध भोजन ग्रहण किया। दिनभर की धर्म-साधना के पश्चात महाआरती में भी श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से सहभागिता की।
शिविर में अनेक शिविरार्थियों ने दस व पांच उपवास की साधना भी की। तप, त्याग, संयम और अनुशासन के माध्यम से शिविरार्थियों ने आत्मसाधना का संकल्प लिया।
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🌺 आज के प्रमुख पुण्यार्जक
विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से किया पुण्यार्जन
प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन राजेंद्र जी, रजनी जी एवं समस्त गोधा परिवार द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया।
श्री सुमित सेंकी ने बताया कि महाआरती का पुण्यार्जन गोपाल-उर्मिला अधिवक्ता परिवार द्वारा किया गया।
श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमती शीला, कुलदीप एवं निधि बज परिवार; उत्तम, निर्मला एवं उत्सव बडजात्या परिवार; मान राजेंद्र, हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार; धनराज, आशा एवं सुरेश जेठानीवाल परिवार; राजेश, सोनल एवं ओमांशी सेठिया परिवार तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार द्वारा किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि दशलक्षण विधान में महावीर मित्तल, प्रेम कासलीवाल, संजय लुहाड़िया, डॉ. संतोष, जम्बू, रानी दुगेरिया एवं सुशीला ठोरा सहित पांच अन्य श्रद्धालुओं ने पुण्यार्जन किया। भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रीमती किश्कन्धा बाई, जम्बू कुमार जी एवं भानु जी द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया।
तत्त्वार्थ सूत्र का पुण्यार्जन सुमित्रा पोरवाल, सुशीला पाटनी, अर्चना सर्राफ एवं सुश्री सृष्टि द्वारा भक्तिभाव से किया गया।
श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य निर्मल सेठिया आरोली को प्राप्त हुआ।
श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य देवकरण-सुलोचना, रोपा वाले को प्राप्त हुआ।
मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
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🪷 गुरुवाणी का अमृत संदेश
आज के प्रवचन का सार
“वस्तुओं का त्याग करना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि वस्तुओं के प्रति ममत्व, राग-द्वेष और आसक्ति का त्याग ही उत्तम त्याग धर्म की सच्ची साधना है। दान से पुण्य का अर्जन होता है, जबकि त्याग आत्मशुद्धि और कर्मनिर्जरा की दिशा में आगे बढ़ाता है। विभाव और परभाव से विरक्त होकर अपने शुद्ध आत्मस्वभाव में स्थित होना ही जीवन का वास्तविक लक्ष्य है।”
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312







