पर्वराज पर्युषण का आठवां चरण : उत्तम त्याग“प्रकृति ने दो मार्ग दिए हैं—एक देकर जाओ या दूसरा छोड़कर जाओ” : अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी
सोनकच्छ/
पर्वों के पर्वराज पर्युषण महापर्व के आठवें चरण में पुष्पगिरी तीर्थ पर उत्तम त्याग धर्म की आराधना श्रद्धा और उत्साह के साथ की गई। पुष्पगिरी तीर्थ प्रणेता गणाचार्य श्री पुष्पदंत सागर महाराज के सानिध्य में वर्षायोग हेतु विराजमान व्रत चक्रवर्ती पट्ट विभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पियूष सागरजी महाराज ससंघ के सानिध्य में पर्युषण महापर्व के विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं।
उत्तम त्याग धर्म पर गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि “प्रकृति ने दो मार्ग दिए हैं—एक देकर जाओ या दूसरा छोड़कर जाओ। आप कुछ भी जोड़ लो, देखना एक दिन सब छोड़कर चले जाओगे। इसलिए मेरी एक बात याद रखना—आप भारत की भूमि पर मेहमान हैं, मालिक नहीं।”
आचार्य श्री ने कहा कि राग-द्वेष और विकारी भावों का त्याग ही उत्तम त्याग है। भीतर से कषाय, द्वेष, ईर्ष्या और विकारों का त्याग करना ही सच्ची त्याग साधना है। त्याग हमारी चेतना को स्वस्थ और प्रसन्न बनाता है। उन्होंने कहा कि त्याग प्रकृति प्रदत्त उपहार है। नदी जल का त्याग करती है, वृक्ष फलों का त्याग करते हैं, गाय दूध का त्याग करती है और मनुष्य मल-मूत्र का त्याग करता है। इसी प्रकार जब आत्मा राग-द्वेष और विकारों का त्याग करती है, तब वह परमात्मा बनने की दिशा में आगे बढ़ती है।
राग-द्वेष जीवन की ढलान, त्याग शिखर की चढ़ाई
आचार्य श्री ने त्याग को सम्मेद शिखर की कठिन चढ़ाई और राग-द्वेष को जीवन की ढलान बताते हुए कहा कि शिखरजी के पहाड़ पर चढ़ने में पुरुषार्थ करना पड़ता है, दम फूलता है और कठिन परिश्रम करना पड़ता है, लेकिन नीचे उतरने में विशेष मशक्कत नहीं करनी पड़ती। इसी प्रकार जीवन में त्याग का मार्ग कठिन अवश्य है, लेकिन वही आत्मकल्याण की ऊंचाई तक पहुंचाता है।
उन्होंने कहा कि “पहाड़ चढ़कर आओ तो आदर-सत्कार मिलता है, नहीं जाओ तो कर्मों की मार सहनी पड़ती है।” भारतीय संस्कृति राग की नहीं, बल्कि त्याग की संस्कृति है। त्याग मनुष्य को भीतर से हल्का करता है और आत्मा को विकारों से मुक्त करने की दिशा में ले जाता है।
दान और त्याग में अंतर समझाया
दान और त्याग के अंतर को सरल उदाहरण से समझाते हुए आचार्य श्री ने कहा कि दान दिया जाता है, जबकि त्याग किया जाता है। दान पराधीन है और त्याग स्वाधीन है। दान करने से पाप का ब्याज चुकता होता है, जबकि त्याग करने से पाप के मूल को समाप्त करने की दिशा में साधना होती है।
उन्होंने कहा कि भारत की महानता उसकी त्याग परंपरा में है। जो केवल जोड़ते चले जाते हैं, वे अंततः मोह-ममता के बंधन में बंध जाते हैं, जबकि जो छोड़ना सीखते हैं, वे जीवन में अमर संदेश छोड़ जाते हैं।
प्रवचन के दौरान आचार्य श्री ने अपने चुटीले अंदाज में कहा—
“जिनके जोड़े हैं, उनके जोड़ो में दर्द है। कुवारों को जोड़ो के दर्द का एहसास ही नहीं है, क्योंकि उनके जोड़े नहीं हैं।”
उनकी इस सहज और हास्यपूर्ण शैली से श्रद्धालुओं के बीच मुस्कान के साथ त्याग के गहरे संदेश की अनुभूति हुई।
आचार्य श्री ने कहा कि उत्तम त्याग केवल वस्तुओं को छोड़ने का नाम नहीं है, बल्कि मन के भीतर बसे राग, द्वेष, अहंकार, ईर्ष्या, लोभ और कषायों को छोड़ना ही वास्तविक त्याग है। जब मनुष्य अपने भीतर के विकारों का त्याग करता है, तभी उसकी चेतना निर्मल होकर आत्मिक शांति की ओर अग्रसर होती है।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में गुरु भक्तों ने प्रवचन का लाभ लिया तथा उत्तम त्याग धर्म की आराधना करते हुए आत्मचिंतन और संयम का संकल्प लिया।
प्रचार-प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा एवं पियूष कासलीवाल,1 औरंगाबाद ने यह जानकारी दी।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312







