धर्म-संस्कारों की डोर थामे 50 दंपतियों ने लिए सात संकल्प

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धर्म-संस्कारों की डोर थामे 50 दंपतियों ने लिए सात संकल्प

 

जिनशासन क्षेत्र में 45 वर्ष तक की आयु के दंपतियों का अनूठा आयोजन, समाज की साक्षी में आठ मूल गुणों की पालना का लिया संकल्प

 

अजमेर।

दांपत्य जीवन में धर्म, संस्कार और संयम को साथ लेकर चलने का संदेश देते हुए जिनशासन क्षेत्र में चल रहे दशलक्षण पर्व के दौरान मंगलवार को विशेष धार्मिक आयोजन हुआ। इसमें 45 वर्ष तक की आयु के 50 दंपतियों ने समाज की साक्षी में धर्ममय जीवन जीने और सात संकल्पों का पालन करने का संकल्प लिया।

 

कार्यक्रम का उद्देश्य गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों के साथ धर्म और संस्कारों को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाना रहा। आयोजन में घरेलू महिलाओं के साथ कामकाजी महिलाएं भी शामिल हुईं, वहीं अनेक पुरुष अपने व्यवसाय और प्रतिष्ठानों से समय निकालकर धार्मिक आयोजन में पहुंचे। दंपतियों की सामूहिक सहभागिता ने आयोजन को विशेष बना दिया।

 

धर्मसभा में दंपतियों को समझाया गया कि गृहस्थ जीवन और धार्मिक जीवन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि संस्कारों के माध्यम से दोनों को साथ लेकर चला जा सकता है। परिवार में धर्म का वातावरण रहेगा तो बच्चों में भी अच्छे संस्कार स्वतः विकसित होंगे।

 

स्वाध्याय से जागता है विवेक, इच्छाओं पर नियंत्रण ही वास्तविक तप : मुनि निष्पक्ष सागर

 

धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि निष्पक्ष सागर महाराज ने कहा कि तप केवल शरीर को कष्ट देने या उपवासों की संख्या बढ़ाने का नाम नहीं है। तप का वास्तविक उद्देश्य कर्मों की निर्जरा, आत्मसंयम और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना है।

 

उन्होंने कहा कि स्वाध्याय भी परम तप है, क्योंकि स्वाध्याय से ज्ञान, समझ और विवेक जागृत होता है। मनुष्य की आदतें बहुत गहरी होती हैं और केवल एक बार प्रवचन सुन लेने से जीवन में परिवर्तन नहीं आता। इसके लिए निरंतर स्वाध्याय, शास्त्रों का अध्ययन और गुरुओं की वाणी का श्रवण आवश्यक है।

 

मुनिश्री ने कहा कि धर्म को केवल सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे व्यवहार और आचरण में उतारना जरूरी है। धार्मिक सभा में बैठने का भी अनुशासन और मर्यादा होती है। शरीर से विनय, व्यवहार में सभ्यता और धर्मस्थल के प्रति सम्मान दिखाई देना चाहिए।

 

उन्होंने बच्चों के संस्कारों पर विशेष जोर देते हुए कहा कि बच्चे केवल उपदेश सुनकर संस्कारित नहीं होते, बल्कि वे बड़ों के आचरण को देखकर सीखते हैं। इसलिए अभिभावकों का व्यवहार ही बच्चों के लिए सबसे बड़ी पाठशाला है।

 

दंपतियों ने लिए सात संकल्प

 

समाज की साक्षी में दंपतियों ने धर्म और संयम से जुड़े संकल्प ग्रहण किए। इनमें प्रमुख रूप से—

 

आठ मूल गुणों की पालना करने का संकल्प।

 

जहां शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन बनाया जाता हो, वहां भोजन नहीं करने का संकल्प।

 

एक-दूसरे के प्रति निष्ठावान रहने और सप्त व्यसनों से दूर रहने का संकल्प।

 

देव, शास्त्र और गुरु के प्रति श्रद्धा एवं सम्मान रखते हुए नियमित पूजन करने का संकल्प।

 

अष्टमी और चतुर्दशी जैसे पर्व के दिनों में ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने का संकल्प।

 

षट् आवश्यक का पालन करने का संकल्प।

 

धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं रचनात्मक गतिविधियों में सहयोग और सहभागिता निभाने का संकल्प।

 

 

आयोजन के दौरान दंपतियों ने संकल्पों को जीवन में उतारने का विश्वास व्यक्त किया। धर्मसभा में उपस्थित समाजजनों ने भी इस पहल को गृहस्थ जीवन में धर्म और संस्कारों को मजबूत करने वाला प्रयास बताया।

 

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

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