पाँच हजार सिर… गुरु के दो हाथ और इतिहास में दर्ज हो गया एक दृश्य

धर्म

पाँच हजार सिर… गुरु के दो हाथ और इतिहास में दर्ज हो गया एक दृश्य

इंदौर

पाँच हजार शिविरार्थी… पाँच हजार सिर… पाँच हजार धड़कते हुए हृदय… और सामने एक संत! सोचिए, यह दृश्य सामान्य नहीं हो सकता। यह कोई साधारण आयोजन नहीं, यह ऐसा दृश्य है जिसे देखकर आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी—क्या सचमुच एक संत ने पाँच हजार लोगों के मस्तक पर अपने हाथों से भगवान की शांतिधारा लगाई थी? और तब शायद हमें कहना पड़ेगा—हाँ, हुआ था… और वह संत थे जगत पूज्य!

 

पंचम काल में पाँच हजार शिविरार्थियों का बिना सुख-सुविधाओं के, गुरुकुल पद्धति में रहना अपने आप में अद्भुत है, लेकिन इस अद्भुतता की भी सीमा वहीं समाप्त नहीं होती। असली आश्चर्य तो तब शुरू होता है जब जगत पूज्य अपने हाथों में भगवान के अभिषेक और शांतिधारा की पवित्रता लेकर एक-एक शिविरार्थी के मस्तक तक पहुँचते हैं।

 

यहाँ कोई वीआईपी नहीं, कोई छोटा-बड़ा नहीं, कोई विशेषाधिकार नहीं। पाँच हजार सिर और गुरु का एक जैसा वात्सल्य! यही तो जगत पूज्य की सबसे बड़ी पहचान है।

 

मैंने बहुत संत देखे हैं, बहुत प्रवचन सुने हैं, बहुत बड़े-बड़े मंच देखे हैं; लेकिन जगत पूज्य जैसा संत, जो हजारों शिविरार्थियों को बालक समझकर उनके बीच उतर जाए, उनके सुख-दुःख को अपना समझे और फिर भगवान के शांतिधारा से पवित्र हाथों से उनके मस्तक को स्पर्श करे—ऐसा दृश्य मेरे लिए तो असाधारण ही नहीं, अविश्वसनीय है।

 

जगत पूज्य की महानता केवल उनके शब्दों में नहीं है। उनकी महानता उस क्षण दिखाई देती है जब हजारों लोग उनके सामने खड़े होते हैं और गुरु की आँखों में सबके लिए एक ही भाव दिखाई देता है—मेरा हर बच्चा सुखी रहे, धर्म में आगे बढ़े, जीवन की कठिनाइयों से न घबराए और अपने भीतर की शक्ति को पहचाने।

 

और आज तो कमाल ही हो गया!

 

पाँच हजार शिविरार्थी और लगभग दो हजार कार्यकर्ता—करीब सात हजार मस्तक! और इन सात हजार मस्तकों तक पहुँचने वाला संत का वात्सल्य! सच पूछिए तो यह केवल शांतिधारा नहीं थी, यह गुरु-प्रेम की ऐसी धारा थी जिसमें हजारों भक्त एक साथ भीग गए।

 

भगवान के अभिषेक से पवित्र हुए वे हाथ जब सिर पर पड़ते होंगे, तो शायद भीतर कोई आवाज कहती होगी—अब चिंता किस बात की? जिस सिर पर गुरु का हाथ पड़ गया, उसे दुनिया की हर कठिनाई से लड़ने का हौसला मिल गया।

 

गुरु का हाथ सिर पर पड़ना केवल हाथ का स्पर्श नहीं होता। श्रद्धावान के लिए वह भरोसा होता है, संबल होता है, आश्वासन होता है और भीतर सोई हुई शक्ति को जगाने वाला स्पर्श होता है। जिसे यह सौभाग्य मिल गया, वह सचमुच अपने भाग्य पर इतराए तो भी कम है।

 

और जगत पूज्य की भव्यता देखिए—इतने बड़े आयोजन के बीच भी उनका मन हजारों बच्चों के बीच बाँटने के लिए तैयार है। शरीर एक है, हाथ दो हैं, लेकिन वात्सल्य ऐसा कि लगता है जैसे हर शिविरार्थी के लिए गुरु के पास अलग से समय है।

 

यही कारण है कि जगत पूज्य केवल मंच पर बैठे संत नहीं हैं। वे हजारों हृदयों में बैठे हुए संत हैं। वे केवल धर्म की बात नहीं करते, वे धर्म को छूने योग्य बना देते हैं। वे केवल आशीर्वाद नहीं देते, भीतर लड़ने की ताकत पैदा कर देते हैं।

 

आज पाँच हजार शिविरार्थियों ने गुरुकुल जीवन अपनाकर एक इतिहास बनाया है, लेकिन जगत पूज्य ने उन पाँच हजार मस्तकों को अपने हाथों से छूकर उस इतिहास पर ऐसा हस्ताक्षर कर दिया है, जिसे मिटाना आसान नहीं होगा।

 

जगत पूज्य, सचमुच आप जैसा कोई नहीं।

आप संतों की भीड़ में एक संत नहीं,

आप तो हजारों भक्तों के सिर पर रखा वह हाथ हैं,

जिसे महसूस कर लेने के बाद आदमी बड़ी से बड़ी मुश्किल से भी कह सकता है—

“आ जा… अब मैं तैयार हूँ!”

 

जय हो जगत पूज्य!

आपका वात्सल्य धन्य है, आपका स्पर्श धन्य है और वे सात हजार मस्तक धन्य हैं, जिन्हें आज आपके हाथों का सौभाग्य मिला।

 

#श्रीश ललितपुर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *