नीचे बैठने वाला ही ऊपर उठता है, विनम्रता से होता है उच्च गोत्र का बंध — मुनि पुंगव श्रीसुधासागरजी महाराज
इंदौर। संसार में हर व्यक्ति कुछ अलग और बेहतर करने की चाह रखता है, लेकिन वास्तविक ऊंचाई पाने के लिए विनम्रता और समर्पण आवश्यक है। कमल कीचड़ में खिलकर भी अपनी सुंदरता और सुगंध से पूरी दुनिया को आकर्षित करता है। उसी प्रकार जो व्यक्ति नीचे रहकर विनम्रता का भाव रखता है, वही जीवन में ऊंचाइयों को प्राप्त करता है। नीचे बैठने वाला ही ऊपर आता है और विनम्र भाव रखने वाला ही उच्च गोत्र का बंध करता है। यह बात राष्ट्रसंत राजकीय अतिथि मुनि पुंगव श्री 108 सुधासागरजी महाराज ने इंदौर के दलाल बाग मैदान में आयोजित विशाल श्रावक संस्कार शिविर में शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए कही।
मुनि श्री ने कहा कि बड़े व्यक्ति के पास छोटा व्यक्ति बैठ जाए तो बड़े की गरिमा और बढ़ जाती है। जीवन में ऊंचा उठने के लिए अहंकार नहीं, बल्कि विनम्रता को अपनाना चाहिए। जिस व्यक्ति के भीतर समर्पण और सरलता होती है, उसकी प्रतिभा और व्यक्तित्व स्वतः निखरता है।
अपनी मान्यताओं के अनुसार धर्म पालन की स्वतंत्रता जरूरी
मुनि श्री सुधासागरजी महाराज ने सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी-अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा-पाठ और धर्म पालन करने का अधिकार है। भगवान राम को मानने वाला श्रीराम की आराधना करे, भगवान महावीर को मानने वाला भगवान महावीर की पूजा और उनके बताए मार्ग पर चले। हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सहित सभी धर्मों के अनुयायी अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा-पाठ और उपासना करें।
उन्होंने कहा कि यही भावना समाज में सांप्रदायिक सौहार्द और सद्भाव को मजबूत करती है। देश का कानून भी सभी धर्मों को अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आस्था और उपासना की स्वतंत्रता प्रदान करता है। हमें इस भावना का सम्मान करना चाहिए।

भक्ति में समर्पण हो, सम्मान की अपेक्षा नहीं
मुनि श्री ने कहा कि भक्ति ऐसी हो जिसमें केवल दिखावा नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण झलके। व्यक्ति को बड़ों और गुरुओं के सामने अपनी इच्छाओं और सम्मान की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। यदि मन में यह इच्छा है कि गुरु मुझे सम्मान दें, तो वास्तविक समर्पण अधूरा है।
उन्होंने कहा कि सच्चा भक्त वही है जो गुरु की इच्छा को अपनी इच्छा मानकर जीवन में उतारने का पुरुषार्थ करे। गुरु की आज्ञा को सर्वोपरि मानते हुए जीवन को संयम, त्याग और सेवा की दिशा में ले जाना चाहिए।
उन्होंने शिविरार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि गुरु की प्रेरणा से गुटखा-तंबाकू जैसे व्यसनों का त्याग करें, रात्रि भोजन का त्याग करें तथा गरीबों की सेवा और गौशालाओं सहित सेवा कार्यों में दान देकर मानवता के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएं।
पराई वस्तु को देखकर मन न ललचाए
मुनि श्री ने कहा कि जीवन में ऐसा पुरुषार्थ करना चाहिए कि पराई वस्तु को देखकर मन में लालच उत्पन्न न हो। जैन दर्शन में कहा गया है— “इच्छा निरोधः तपः” अर्थात इच्छाओं और आकांक्षाओं का निरोध ही तप है। मनुष्य जितना अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करता है, उतना ही आत्मिक रूप से मजबूत बनता है।
उन्होंने कहा कि त्यागी और व्रती के प्रति कभी नफरत नहीं करनी चाहिए तथा गरीब, भिखारी और दरिद्र व्यक्ति से घृणा नहीं करनी चाहिए। पराए धन पर बुरी नजर नहीं रखनी चाहिए और अपनी सीमा में रहकर ही धन-धान्य का संग्रह करना चाहिए।
मुनि श्री ने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि विनम्रता, संयम, त्याग, सेवा और आत्मसंयम को जीवन में उतारना ही धर्म की वास्तविक साधना है।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312





