देश की गरिमा बनाए रखना हर नागरिक का धर्म, ऐसा कोई काम न करें जिससे राष्ट्र बदनाम हो : मुनि श्री सुधासागर महाराज
“पाप करने से पहले सोचें, कहीं उसकी बदनामी का बोझ हमारी संतान को न उठाना पड़े”
इंदौर।
“जीवन में ऐसा कोई काम मत करना, जिससे देश बदनाम हो। अपने देश के लिए कुछ करो और भारत की गौरवशाली संस्कृति एवं पवित्र परंपराओं को आगे बढ़ाने का संकल्प लो।”
यह प्रेरणादायी संदेश राष्ट्रसंत, राजकीय अतिथि मुनि पुंगव श्री सुधासागर महाराज ने दलालबाग मैदान में आयोजित विशाल अखिल भारतीय श्रावक संस्कार शिविर की धर्मसभा को संबोधित करते हुए दिया।
मुनिश्री ने कहा कि भारत भूमि संतों, महापुरुषों और तीर्थंकर भगवंतों की तपस्या से पवित्र हुई है। यह आर्यखंड महान पुरुषों की जन्मस्थली रहा है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र जैसे महापुरुषों ने अपने तप, त्याग और आदर्शों से इस भूमि को गौरवान्वित किया है। ऐसे पवित्र देश में जन्म लेना हमारे लिए सौभाग्य है और इसकी गरिमा बनाए रखना हमारा दायित्व भी है।

उन्होंने कहा कि हमारी एक गलत आदत या गलत कर्म केवल हमें ही नहीं, बल्कि हमारे परिवार, समाज और देश की प्रतिष्ठा को भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने आचरण के प्रति सजग रहना चाहिए।
तीर्थ किसी एक समाज के नहीं, समूची मानवता की धरोहर
मुनिश्री ने कहा कि आज अनेक पवित्र स्थानों और तीर्थ क्षेत्रों की पवित्रता प्रभावित हो रही है। किसी भी समाज या संप्रदाय का तीर्थ हो, तीर्थ तो तीर्थ होता है। उसकी पवित्रता और गरिमा बनाए रखना प्रत्येक व्यक्ति का दायित्व है।
उन्होंने कहा कि यदि कहीं तीर्थ की पवित्रता बचाने के लिए कार्य करने का अवसर मिले तो हमें आगे बढ़कर अपनी भूमिका निभानी चाहिए। आवश्यकता पड़े तो अन्य कार्यों को छोड़कर भी ऐसे पुण्य कार्य में सहयोग करना चाहिए। धर्म की उपेक्षा का सबसे अधिक प्रभाव तीर्थ क्षेत्रों पर पड़ा है, इसलिए तीर्थों की मर्यादा और पवित्रता की रक्षा के लिए समाज को जागरूक होना होगा।
पाप छोड़ना पहला संकल्प, किसी को धर्म से रोकना नहीं
मुनिश्री सुधासागर महाराज ने कहा कि जीवन में सबसे पहले पाप को छोड़ने का प्रयास करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति स्वयं पाप से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पा रहा है, तो कम से कम अपने आचरण से दूसरे व्यक्ति को धर्म से विमुख न करे।
उन्होंने भावपूर्ण संदेश देते हुए कहा कि कोई भी गलत कार्य करने से पहले यह अवश्य सोचें कि कहीं आपके कर्मों की बदनामी का बोझ आपकी संतान को तो नहीं उठाना पड़ेगा। हमारी गलतियों का दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों को न भुगतना पड़े, इसका ध्यान रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि संसार में रहना है तो दूसरों के प्रति मैत्री, प्रमोद, करुणा और माध्यस्थ भाव रखना चाहिए। यही स्वस्थ सामाजिक जीवन और आत्मकल्याण का मार्ग है।
महापुरुषों की जन्मभूमि और तीर्थ क्षेत्रों में नशे पर प्रतिबंध की आवश्यकता
मुनिश्री ने कहा कि जहां-जहां हमारे महापुरुषों ने जन्म लिया, तप किया अथवा विचरण किया, उन पवित्र तीर्थ भूमियों की मर्यादा बनाए रखना आवश्यक है। ऐसी पवित्र भूमि पर नशे जैसी प्रवृत्तियों को स्थान नहीं मिलना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति त्याग, संयम और मर्यादा की संस्कृति है। हमारी मौज-मस्ती और गलत आदतें कहीं हमारी संस्कृति को आघात न पहुंचाएं। हम स्वयं कितने ही अशुद्ध क्यों न हों, लेकिन अपने परिवार, समाज, जाति और देश को बदनाम करने वाला कोई कार्य नहीं करना चाहिए।
मुनिश्री ने आह्वान किया कि प्रत्येक नागरिक ऐसा जीवन जिए, जिससे देश का गौरव बढ़े, समाज की प्रतिष्ठा बढ़े और आने वाली पीढ़ियां अपने पूर्वजों पर गर्व कर सकें।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312








