*अन्तर्मना उवाच* (15 जून!)आज कल के रिश्ते, नौकरी जैसे हो गये..*बेहतर ओफर मिलते ही चैन्ज हो जाते हैं..!*
*आज कल के रिश्ते, नौकरी जैसे हो गये..*
*बेहतर ओफर मिलते ही चैन्ज हो जाते हैं..!*
इसलिये रिश्तों और सम्बन्धों में ना आत्मीयता है, ना अपनापन है। सिर्फ और सिर्फ औपचारिकता है। *अब रिश्तों में आंतरिक लगाव और माधुर्य नहीं रहा।* वजह स्पष्ट है कि हम घर में वही बने रहते हैं जो दुकान, आफिस, दफ्तर और बाजार में होते हैं। भोजन करने भी बैठते हैं तो तिजोरी थाली के आसपास ही आदृस रूप में लेते हैं। दरअसल होता यह है कि वह तिजोरी तुम्हारे और पत्नी के बीच, भावनात्मक रूप से जुड़ने में बाधा बन जाती है।

जब तुम अपने बच्चों से मिलते हो, उनसे बतियाते हो, तब भी तुम सहज रूप से उनसे घुल मिल नहीं पाते हो। तब भी तुम कोई लबादा ओढे़ हुये रहते हो।
*संसार का कोई भी व्यक्ति 24 घन्टे राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, उद्योगपति या ओफिसर बनकर नहीं रह सकता।* जब वे अपने घर पर होते हैं या निजी जीवन शैली को जीते हैं, तो सामान्य आदमी होते हैं। घर के लोग उनसे वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा आप अपने घर में करते हैं। यदि ये 24 घंटे उस पद पर रहे, तो हो सकता है वे पागल हो जाये।
जब वे जन समस्याओं के समाधान के लिए निकलते हैं, तब वे अपने उस कद पद का जीवन जीते हैं और जीना भी चाहिए। *इसलिये — रिश्तों की कद्र जीते जी करो,, मरने के बाद तो पराये भी रो देते हैं।* वक्त निकालकर अपनों से बात कर लिया करो। अगर अपने ही नहीं होंगे तो वक्त का क्या करोगे-?
*मन में वहम, बुद्धि में अहम, और व्यवहार में शर्म आ जाये तो रिश्तों की हार सुनिश्चित है…!!!*। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजममंडी 9929747312
