उत्तम शौच धर्म पर मुनि श्री योगसागर जी ने दिया आत्मशुद्धि और संतोष का संदेशमन की शुचिता ही उत्तम शौच धर्म का सार : मुनि श्री योगसागर जी
कोटा, 19 सितम्बर।
दशलक्षण महापर्व के चतुर्थ दिवस उत्तम शौच धर्म के पावन अवसर पर श्री पुष्पदंत भगवान का मोक्ष कल्याणक भक्ति एवं आनंद के साथ मनाया गया। इस अवसर पर ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि आत्मा में शुचिता लाना और उसके बाधक तत्वों को दूर करना ही उत्तम शौच धर्म का सार है।
मुनिश्री ने कहा कि मन की सफाई का नाम ही उत्तम शौच धर्म है। जीव और अजीव द्रव्य अपनी-अपनी अवस्था में शुद्ध और अशुद्ध परिणमन करते हैं, जबकि धर्म, अधर्म, आकाश और काल द्रव्य शुद्ध ही रहते हैं। जीवात्मा में शुद्ध होने की शक्ति विद्यमान है। आत्मा जब पूर्ण शुद्ध अवस्था को प्राप्त कर लेती है, तब वह पुनः अशुद्ध नहीं होती।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को भूत से नाता तोड़कर और भविष्य की अपेक्षा छोड़कर वर्तमान में जीना सीखना चाहिए। भूत सपना है, भविष्य कल्पना है और वर्तमान ही अपना है। अतीत की स्मृतियों और भविष्य की कल्पनाओं में उलझने के कारण आत्मा दुखी होती है। अनुभूति केवल वर्तमान की होती है, इसलिए पर की पहचान में उलझने के बजाय स्व की पहचान करना आवश्यक है।
मुनिश्री ने कहा कि आध्यात्मिकता का वास्तविक अर्थ है—स्व को जानना, स्व में रहना और स्व को देखना। हमारी दृष्टि बाहर की ओर नहीं, अंतर की ओर होनी चाहिए। पर को देखकर द्रष्टा को भूल जाना ही हमारी सबसे बड़ी भूल है। जब दृष्टि अंतरमुखी होगी, तभी आत्मा में शांति और शुचिता का अनुभव होगा।
उन्होंने कर्म सिद्धांत की ओर संकेत करते हुए कहा कि पूर्व में धन का दुरुपयोग किया होगा तो वह वर्तमान में दरिद्रता का कारण बन सकता है। ज्ञान का दुरुपयोग किया तो ज्ञानावरण कर्म के उदय का कारण बन सकता है और पूर्व में संयम की उपेक्षा की होगी तो आज संयम के भाव सहज नहीं बनते। इसलिए अपने वर्तमान परिणामों को समझते हुए आत्मनिरीक्षण करना चाहिए।
संतोष ही उत्तम शौच धर्म का महत्वपूर्ण लक्षण
संतोष को उत्तम शौच धर्म का महत्वपूर्ण लक्षण बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि जीवन केवल धन कमाने के लिए नहीं है, बल्कि धन का सदुपयोग करने के लिए है। तुलसीदास जी की पंक्ति का भाव बताते हुए उन्होंने कहा कि हमने अपनी रक्षा के लिए धन कमाया था, लेकिन स्थिति ऐसी हो गई कि हम धन की रक्षा में ही लग गए। धन आएगा तो एक दिन धर्म जा सकता है, इसलिए लक्ष्मी हमारे पीछे चले, हम लक्ष्मी के पीछे न भागें।
उन्होंने कहा कि संतोषी व्यक्ति वर्तमान में जीता है, जबकि असंतोषी व्यक्ति भूत और भविष्य में उलझा रहता है। न्याय और नीति से अर्जित धन ही सुख-शांति तथा आगामी भव के लिए हितकारी है। अन्याय से अर्जित धन का उपयोग दान आदि में करने से भी बचना चाहिए। ईमानदारी और धर्मनीति से अर्जित धन जीवन में पुण्य एवं शांति का कारण बनता है।
मुनिश्री ने कहा कि जर, जोरू और जमीन के मोह में पड़कर मनुष्य धर्म से विमुख हो सकता है। इसलिए जीवन में संतोषवृत्ति और संयम को धारण करने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने धर्मप्रेमियों से आह्वान किया कि अपेक्षा को छोड़कर उपेक्षा नहीं, बल्कि समता और संतोष को अपनाएं। बहिर्दृष्टि के स्थान पर अंतरदृष्टि रखें और आत्मा में शुचिता लाने का सतत प्रयास करें। यही उत्तम शौच धर्म की सच्ची भावना है।
शिविरार्थियों ने साधना, संयम और धार्मिक अनुशासन के साथ मनाया उत्तम शौच धर्म
शिविर निदेशक श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि दशलक्षण आध्यात्मिक योग साधना एवं संस्कार शिविर में अनेक शिविरार्थियों ने उपवास सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भक्तिभाव से सहभागिता की। शिविरार्थियों ने शांतिधारा, दशलक्षण विधान, भक्तामर विधान, तत्त्वार्थ सूत्र एवं जिज्ञासा-समाधान सहित विविध धार्मिक गतिविधियों में सहभागिता की।
शिविर के दौरान शिविरार्थियों ने एक समय शुद्ध भोजन ग्रहण करते हुए धार्मिक अनुशासन का पालन किया। दिनभर की धर्म-साधना के पश्चात महाआरती में भी श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर धर्मलाभ अर्जित किया।
🌺 आज के प्रमुख पुण्यार्जक
विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक पुण्यार्जन कर अर्जित किया धर्मलाभ
प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन सुधा, अकुल प्रिया, अभिषेक, निशिता, चंबल डेयरी, हुकुमचंद जी, महावीर जी एवं सांवला सहित समस्त परिवारों द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया।
कलश स्थापना का पुण्यार्जन श्री नरेन्द्र जी, मधु जी, राजकुमार जी, ज्योति जी, नित्यम जी, समस्त बोरखण्डया परिवार, निर्मल जी, अंकित जी, विकास जी, समस्त मोर्य परिवार, समस्त सेठिया परिवार तथा महावीर जी, आशा जी, अभिषेक जी, ऐश्वर्या जी एवं समस्त हरसोरा परिवार द्वारा किया गया।
श्री सुमित सेंकी ने बताया कि महाआरती एवं श्रावक श्रेष्ठी का पुण्यार्जन परिवार द्वारा किया गया।
श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमती विमला, धनराज एवं संतोष जेठानिवाल परिवार; राजेश, सोनल एवं ओमांशी सेठिया परिवार; श्रीमती सुशीला बाई जी, विवेक जी ठोरा परिवार; आनंदीलाल जी एवं संजय चवारिया; श्रीमान अजित कुमार जी, कनक जी, विकास जी, प्रीति जी लुहाड़िया परिवार; तथा श्रीमान उमेश जी, सविता जी, विकास जी फान्दोत परिवार; श्रीमान निर्मल कुमार जी, अंकित जी, विकास जी सेठिया परिवार द्वारा किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि दशलक्षण विधान में महावीर मित्तल, प्रेम कासलीवाल, संजय लुहाड़िया, डॉ. संतोष, जम्बू, रानी दुगेरिया एवं सुशीला ठोरा सहित अन्य श्रद्धालुओं ने पुण्यार्जन किया। भक्तामर विधान का आयोजन महावीर मित्तल एवं महावीर नगर महिला मंडल द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया।
तत्त्वार्थ सूत्र का पुण्यार्जन अंजली, विद्या जैन, प्रेमलता पाटोदी द्वारा तथा वाचन दमयंती, प्रीति लुहाड़िया एवं अक्षरा ने किया।
श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य उपवास को प्राप्त हुआ।
श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य जय कुमार एवं रजनी जेसवाल को प्राप्त हुआ।
मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
🪷 गुरुवाणी का अमृत संदेश
आज के प्रवचन का सार
🌿 मन की शुचिता ही उत्तम शौच धर्म है।
🌿 भूत सपना है, भविष्य कल्पना है और वर्तमान ही अपना है।
🌿 पर को देखने के बजाय स्व को पहचानना ही आत्मकल्याण की दिशा है।
🌿 स्व को जानना, स्व में रहना और स्व को देखना ही आध्यात्मिकता है।
🌿 बहिर्दृष्टि छोड़कर अंतरदृष्टि अपनाएं।
🌿 धन जीवन के सदुपयोग का साधन है, जीवन का लक्ष्य नहीं।
🌿 संतोषी व्यक्ति वर्तमान में जीता है।
🌿 न्याय और नीति से अर्जित धन ही सुख-शांति का कारण बनता है।
🌿 समता, संतोष, संयम और आत्मनिरीक्षण से आत्मा में शुचिता आती है।


अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

