कैसे होगा मरण, सुमरण को प्राप्त प.पू. पट्ट गणिनी आर्यिका श्री विज्ञमति माताजी

धर्म

कैसे होगा मरण, सुमरण को प्राप्त
प.पू. पट्ट गणिनी आर्यिका श्री विज्ञमति माताजी
श्री सम्मेदशिखर, मध्यलोक
परम पूज्या गणिनी प्रमुख आर्यिका 105 श्री विशुद्धमति माताजी की प्रियाग्र शिष्या, पट्ट गणिनी आर्यिका 105 श्री विज्ञमति माताजी द्वारा, महोपकारी आचार्य श्री अमितगति द्वारा सृजित मरण कंडिका ग्रंथ की वाचना करते हुए कहा गया, कि हर वह आत्मा जो संसारी है उसका मरण निश्चित है। अर्थात संसारी आत्मा मरण धर्मा हैं। प्रतिक्षण आयु का क्षीण होना नित्य मरण या आविचि मरण हैं। यद्यपि संसारी जीव मरण धर्मा हैं तथापि अज्ञानियों का मरण बाल मरण तथा ज्ञानियों का मरण पंडित मरण, सुमरण, समाधिमरण है। क्योंकि ज्ञानी जीव स्वयं बुद्धिपूर्वक शरीर को छोड़ने का पुरुषार्थ करता है जबकि अज्ञानी को स्वयं शरीर ही छोड़ देता है। विशेष रूप से बताते हुए माताजी ने कहा कि आचार्य भगवन ने आगम में पंडित पंडित मरण, पंडित मरण, बाल पंडित मरण, बाल मरण, बाल बाल मरण, ये पांच भेद मरण के कहे हैं। इनमें से आदि के तीन भेद शुभ कहे हैं।

 

 

 

 

आज के परिपेक्ष पर कटाक्ष करते हए पुनः पूज्या माताजी ने कहा कि प्राचीन समय में ऐसे महापुरुष भी हुए हैं जो अपने एक सफेद बाल को देखकर ही वैराग्य को प्राप्त हो गए थे। लेकिन लेकिन कैसा हैं रे तू मानव ! और कैसी हैं तेरी आधुनिकता कि पूरे बाल सफेद हो गए फिर भी तुझे वैराग्य नहीं हो रहा है। पूज्या मातजी ने कहा कि कितने भी लोशन, दूध मलाई लगा लेना, सफेद बालों को डाई करवा लेना, घुटने खराब हो जाने पर इन्हें बदलवा लेना, आंखों खराब होने पर लेंस डलवा लेना, लेकिन फिर भी यह नश्वर शरीर कभी अविनश्वरता को प्राप्त नहीं हो सकता।

 

इसीलिए प्रथम देव शास्त्र गुरु के प्रति सम्यक श्रद्धान, सम्यक ज्ञान और पश्चात सम्यक आचरण प्राप्त करना होगा। क्योंकि बोध के बिना बोधि की प्राप्ति नहीं हो सकती और बोधि नहीं है तो पंडित और पंडित पंडित मरण कदापि संभव नहीं हो सकता।

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट

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