मन से मर गया इंसान, इसलिए जीते-जी भटक रही उसकी आत्मा : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी

धर्म

मन से मर गया इंसान, इसलिए जीते-जी भटक रही उसकी आत्मा : अंतर्मना आचार्य प्रसन्न सागरजी

 

पुष्पगिरी तीर्थ में गुरु सान्निध्य में धार्मिक आयोजन, जीवन की सच्चाई को स्वीकार करने और आत्मचिंतन का दिया संदेश

 

पुष्पगिरी तीर्थ, सोनकच्छ। 

जीवन की वास्तविकता को समझना, उसे स्वीकार करना और उसी के अनुरूप स्वयं को ढालना ही सच्चे आध्यात्मिक जीवन की पहचान है। आज मनुष्य बाहरी सुख-सुविधाओं की दौड़ में इतना उलझ गया है कि भीतर से अशांत होता जा रहा है। यही कारण है कि आज इंसान शरीर से नहीं, बल्कि मन से मर गया है और उसकी आत्मा जीते-जी भटक रही है।

 

 

 

 

यह प्रेरणादायी विचार व्रत चक्रवर्ती, पट्टविभूषण अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने पुष्पगिरी तीर्थ में गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

 

पहले मृत्यु के बाद भटकती थी आत्मा, अब जीते-जी भटक रहा इंसान

 

आचार्यश्री ने कहा कि पहले लोग कहते थे कि मृत्यु के बाद आत्मा भटकती है, लेकिन आज स्थिति बदल गई है। आज का मनुष्य जीते-जी मानसिक अशांति, मोह, लोभ और इच्छाओं के जाल में भटक रहा है। उसके पास सुविधाएं बढ़ गईं, लेकिन मन की शांति कम होती चली गई।

 

उन्होंने कहा कि जीवन की सच्चाई को जान लेना पर्याप्त नहीं है। उसे स्वीकार करना ही वास्तविक आध्यात्मिकता है।

 

सांप के काटने से मृत बेटे की कहानी से समझाई जीवन की सच्चाई

 

आचार्यश्री ने एक मार्मिक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक व्यक्ति के बेटे को सांप ने काट लिया और उसकी मृत्यु हो गई। लोग शव को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान ले जा रहे थे। पिता भी बेटे की शवयात्रा में साथ चल रहा था। रास्ते भर लोग कहते जा रहे थे— “राम नाम सत्य है।”

 

अभी शवयात्रा आधे रास्ते में ही पहुंची थी कि अचानक सांप का जहर उतर गया और बेटा जीवित होकर उठ बैठा। लोगों की आवाज तब भी वही थी—“राम नाम सत्य है।”

 

बेटे को जीवित देखकर पिता ने तत्काल कहा— “बस करो! कब से राम नाम सत्य है की रट लगा रखी है? अब मेरा बेटा ही सत्य है।”

 

आचार्यश्री ने कहा कि यही मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना है। सच्चाई को जानना अलग बात है, उसे मानना अलग और उसे हृदय से स्वीकार कर लेना सबसे बड़ी बात है।

 

मनुष्य मृत्यु को सत्य मानता तो है, लेकिन जब मृत्यु की बात स्वयं पर आती है तो उसे स्वीकार नहीं करना चाहता। इसी कारण उसके भीतर मृत्यु का भय बना रहता है।

 

मृत्यु से डरें नहीं, जीवन को सार्थक बनाएं

 

आचार्यश्री ने कहा कि जो व्यक्ति जीवन की वास्तविकता को स्वीकार कर लेता है, उसके लिए मृत्यु भय का कारण नहीं रहती। ऐसा व्यक्ति जीते-जी मृत्यु को भी महोत्सव बनाना सीख जाता है।

 

मृत्यु को बदलने की कोशिश करने के बजाय मनुष्य को अपने जीवन को बदलने की आवश्यकता है।

 

उन्होंने कहा—

 

“मृत्यु को सुधारने से मृत्यु कभी नहीं सुधरेगी,

जीवन को सुधारने से मृत्यु स्वयं सहज हो जाएगी।”

 

आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि जीवन की क्षणभंगुरता को समझें और अहंकार, मोह, लोभ तथा आसक्ति को धीरे-धीरे कम करें। आत्मचिंतन, संयम और सदाचार को जीवन का आधार बनाकर अपने भीतर शांति और संतोष का निर्माण करें।

 

श्रद्धापूर्वक सुना प्रेरणादायी प्रवचन

 

पुष्पगिरी तीर्थ में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में गुरु भक्तों ने आचार्यश्री के प्रेरणादायी प्रवचन का श्रद्धापूर्वक श्रवण किया। प्रवचन के दौरान जीवन की सच्चाई और आत्मचिंतन से जुड़े संदेशों ने उपस्थित श्रद्धालुओं को गहराई से प्रभावित किया।

 

प्रचार-प्रसार संयोजक: नरेंद्र अजमेरा एवं पीयूष कासलीवाल, औरंगाबाद

जानकारी संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी

मोबाइल: 9929747312

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