आत्मकल्याण की भावनाओं से सराबोर हुआ लोक कल्याण महामंडल विधान*
*आठ दिवसीय धार्मिक अनुष्ठान का भावपूर्ण समापन, जिनवाणी और वीतरागता के संदेश से गूंजा विधान परिसर*12-13 सितंबर को होगा आध्यात्मिक राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी का आयोजन
बड़ौत,
तीर्थंकर बनने का मार्ग प्रशस्त करने वाली पवित्र सोलहकारण पर्व आराधना के अंतर्गत मंडी बड़ौत स्थित श्री अजितनाथ दिगंबर जैन प्राचीन मंदिर में आयोजित आठ दिवसीय लोक कल्याण महामंडल विधान का रविवार को श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के बीच भव्य समापन हुआ। 30 अगस्त से 6 सितंबर तक चले इस महाआयोजन में प्रतिदिन श्रद्धालुओं ने विविध भावनाओं के साथ जिनेंद्र प्रभु की आराधना की और आत्मशुद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया।
विधान का आयोजन श्री अजितनाथ दिगंबर जैन प्राचीन मंदिर कमेटी, मंडी बड़ौत के तत्वावधान में प.पू. अध्यात्म योगी आचार्य श्री 108 आर्जवसागरजी महाराज ससंघ के पावन सान्निध्य में संपन्न हुआ। आठ दिनों तक अजितनाथ सभागार में अभिषेक शांतिधारा,पूजन, विधान, अर्घ्य समर्पण, मंगल प्रवचन एवं धार्मिक अनुष्ठानों की अविरल धारा बहती रही। समापन अवसर पर श्रद्धालुओं के चेहरों पर आयोजन पूर्ण होने की प्रसन्नता के साथ-साथ इन आध्यात्मिक क्षणों से बिछुड़ने की भावुकता भी स्पष्ट दिखाई दी।
*भावनाओं की आराधना से हुआ आत्मचिंतन*
लोक कल्याण महामंडल विधान की विशेषता यह रही कि यह केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रत्येक दिन की आराधना ने साधकों को भक्ति, विनय, सेवा, तप, संयम और आत्मचिंतन का संदेश दिया। दर्शन विशुद्धि से लेकर अर्हद्भक्ति, आचार्यभक्ति और बहुश्रुतभक्ति आदि सहित मार्ग प्रभावना,प्रवचन वात्सल्य,जैसी भावनाओं के अर्घ्य श्रद्धापूर्वक समर्पित किए गए।
इन भावनाओं के माध्यम से श्रद्धालुओं ने भगवान के गुणों का स्मरण करने के साथ यह भावना भी धारण की कि धर्म केवल मंदिर और विधान तक सीमित न रहे, बल्कि व्यवहार और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई दे।
दिखने आचार्य श्री ने कहा कि समवसरण केवल एक दिव्य सभा का नाम नहीं, बल्कि वह जिनवाणी का ऐसा पवित्र केंद्र है, जहाँ से समस्त जीवों को आत्मकल्याण का मार्ग प्राप्त होता है। भगवान की वाणी किसी एक वर्ग या समुदाय के लिए नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव को उसके कल्याण का मार्ग दिखाने वाली होती है।
विधान ने दिया जीवन को धर्ममय बनाने का संदेश
आठ दिनों तक चले इस आयोजन ने समाज के समक्ष यह संदेश रखा कि पर्व और विधान की सार्थकता तभी है, जब उनके माध्यम से मनुष्य अपने भीतर परिवर्तन का संकल्प ले। पूजा की वेदी पर समर्पित प्रत्येक अर्घ्य वस्तुतः अपने भीतर के विकारों को छोड़ने और आत्मगुणों को जागृत करने की भावना का प्रतीक है।
समापन अवसर पर श्रद्धालुओं ने भावपूर्वक धार्मिक क्रियाओं में सहभागिता की और विधान की निर्विघ्न पूर्णता पर मंगल भावना व्यक्त की। सभागार परिसर में भक्तिमय वातावरण के बीच जिनेंद्र भगवान की जय-जयकार एवं जिनवाणी के मंगल संदेश से वातावरण गुंजायमान रहा।
लोक कल्याण महामंडल विधान का समापन आठ दिनों में जागृत हुई धर्म, भक्ति, संयम और आत्मकल्याण की भावनाएं श्रद्धालुओं के मन में नई आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार कर गईं।
**12-13 सितंबर को होगा राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी का आयोजन*
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धार्मिक एवं बौद्धिक वातावरण को आगे बढ़ाते हुए 12 एवं 13 सितंबर 2026, शनिवार-रविवार को बड़ौत की चातुर्मास स्थली में “आध्यात्मिक राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी” का आयोजन किया जाएगा।
यह महत्वपूर्ण संगोष्ठी आचार्य श्री आर्जवसागरजी महाराज द्वारा रचित ‘आगम अनुयोग ग्रंथ’ पर आधारित होगी। S.A. University, नवादा (बिहार) के तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी को आचार्य श्री आर्जवसागरजी महाराज ससंघ का पावन सान्निध्य प्राप्त होगा।
संगोष्ठी का उद्देश्य आगम के गहन अध्यात्म पक्ष, अनुयोग परंपरा और आचार्यश्री की रचनाधर्मिता पर विद्वत् विमर्श के माध्यम से समाज को जिनागम के गंभीर एवं प्रामाणिक स्वरूप से परिचित कराना है। देश के विद्वानों, अध्येताओं एवं धर्मचिंतकों के लिए यह आयोजन ज्ञान-विमर्श का महत्वपूर्ण अवसर बनने जा रहा है।
संगोष्ठी के निर्देशक डॉ. श्रेयांशकुमार जी, बड़ौत तथा संगोष्ठी संयोजक इंजीनियर बहिन ऋषिका जैन, दमोह हैं। आयोजन श्री 1008 अजितनाथ दिगंबर जैन प्राचीन मंदिर कमेटी, मंडी बड़ौत के तत्वावधान में होगा।
इस प्रकार आठ दिवसीय लोक कल्याण महामंडल विधान ने जहाँ श्रद्धालुओं को भक्ति और आत्मसाधना की प्रेरणा दी, वहीं आगामी आध्यात्मिक राष्ट्रीय विद्वत् संगोष्ठी उसी आध्यात्मिक चेतना को अध्ययन, चिंतन और विद्वत् विमर्श के व्यापक धरातल पर ले जाने वाली है।




