गुरु ने शिष्य की नजर उतारी, आंसू पोंछकर गले लगाया; आचार्य पुष्पदंत सागर महाराज ने प्रसन्न सागर महाराज को पट्टाचार्य पद से किया विभूषित

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गुरु ने शिष्य की नजर उतारी, आंसू पोंछकर गले लगाया; आचार्य पुष्पदंत सागर महाराज ने प्रसन्न सागर महाराज को पट्टाचार्य पद से किया विभूषित

 

पुष्पगिरी।

 

पुष्पगिरी तीर्थ पर शनिवार से अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर महाराज के दो दिवसीय ऐतिहासिक पट्टाचार्य पद विभूषण महोत्सव का भव्य शुभारंभ हुआ। देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस ऐतिहासिक अवसर के साक्षी बनने के लिए पुष्पगिरी पहुंचे। गुरु-शिष्य की भावपूर्ण परंपरा, तप-साधना और संस्कारों से सराबोर इस आयोजन ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।

गुरु ने उतारी शिष्य की नजर, झलके आंसू तो पोंछकर लगाया गले

 

महोत्सव की शुरुआत शनिवार सुबह प्रभातफेरी और ध्वजारोहण के साथ हुई। पट्टविभूषण संस्कार से पूर्व आचार्य श्री 108 पुष्पदंत सागर महाराज अपने शिष्य अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर महाराज का हाथ पकड़कर उन्हें नवीन चौकी तक लेकर आए।

मंत्रोच्चार के बीच जब गुरुदेव ने अपने शिष्य की नजर उतारी तो भावुकता का ऐसा दृश्य बना कि अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर महाराज की आंखों से आंसू छलक पड़े। गुरु आचार्य पुष्पदंत सागर महाराज ने स्वयं उनके आंसू पोंछे, उन्हें गले लगाया और स्नेहपूर्वक चौकी पर बिठाकर पट्टाचार्य पद के संस्कार संपन्न कराए। गुरु-शिष्य के इस आत्मीय मिलन ने पूरे परिसर को भावनाओं से भर दिया।

 

इसके बाद अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर महाराज ने अपने गुरु आचार्य श्री पुष्पदंत सागर महाराज के चरण पखारे और चरण रज को मस्तक पर लगाया। उनकी गृहस्थ जीवन की माता श्रीमती शोभा जैन सहित परिवारजनों ने भी पट्टाचार्य पद से विभूषित आचार्य श्री प्रसन्न सागर महाराज की भक्तिभाव से पूजन-अर्चना की।

 

“गुरुदेव, डर लग रहा है… आपके बगल में कैसे बैठूंगा”

 

पट्टविभूषण संस्कार के बाद आचार्य श्री प्रसन्न सागर महाराज ने अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा कि “पट्टविभूषण शब्द बहुत प्यारा है, लेकिन बहुत गहरा भी है। यह गुरु के विश्वास, जिनशासन की सेवा तथा तप-त्याग को आचरण में उतारने की जिम्मेदारी का पद है।”

 

उन्होंने कहा कि दीक्षा लिए 37 वर्ष हो चुके हैं। इतने वर्षों में कभी गुरुदेव के सामने बैठने का अवसर नहीं आया, हमेशा नीचे ही बैठते रहे। इसलिए मन में यह भाव था कि गुरुदेव के बगल में इस आसन पर कैसे बैठूंगा।

 

उन्होंने कहा कि जैन समाज की यह विशेषता है कि गुरु अपने शिष्य को अपने जैसा बनाकर अपने स्थान पर बिठाता है। जब तक गुरुदेव का साथ रहेगा, वे स्वयं को उनके शिष्य और मुनि के रूप में ही देखते रहेंगे।

 

गुरुदेव के प्रति भाव व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा—“आपने दांत दिए हैं तो दाना भी देना।” उन्होंने विश्वास दिलाया कि वे गुरु के विश्वास पर खरा उतरने का निरंतर प्रयास करेंगे। साथ ही समाजजनों से अच्छे सेवक और साधक बनने का आह्वान किया।

 

“गुरुदेव ने चुना है हीरा” : कैलाश विजयवर्गीय

 

दोपहर की बेला में मध्यप्रदेश सरकार के नगरीय विकास एवं आवास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय भी पुष्पगिरी तीर्थ पहुंचे। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री पुष्पदंत सागर महाराज ने अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर महाराज के रूप में एक हीरा चुना है। दोनों संत समाज के लिए अनमोल हैं।

उन्होंने आचार्य श्री प्रसन्न सागर महाराज की तप-साधना और उपवास को साधना का प्रत्यक्ष उदाहरण बताते हुए उनके संयममय जीवन की सराहना की।

 

सिंहासन का लोकार्पण, भक्तिभाव से हुआ चंदन तिलक

 

इस ऐतिहासिक अवसर पर सिंहासन के लोकार्पण का सौभाग्य श्री मनीष-सपना गोधा एवं मंत्री श्री कैलाश विजयवर्गीय को प्राप्त हुआ। वहीं चंदन तिलक की रस्म का सौभाग्य मनोज-शिल्पा झांझरी परिवार, हैदराबाद को मिला।

 

101 फीट ऊंचे पोल पर लहराया 51 फीट का तिरंगा

 

पट्टाचार्य पद विभूषण महोत्सव के साथ पुष्पगिरी तीर्थ द्वारा संचालित मां जिनवाणी पब्लिक स्कूल में स्वतंत्रता दिवस समारोह भी आयोजित किया गया। इस अवसर पर आचार्य श्री 108 पुष्पदंत सागर महाराज ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि भारत महापुरुषों और तीर्थंकरों की धरती है।

 

समारोह का विशेष आकर्षण रहा 101 फीट ऊंचे पोल पर 51 फीट विशाल तिरंगे का ध्वजारोहण। विशाल तिरंगे के लहराते ही पूरा परिसर राष्ट्रभक्ति के भाव से ओतप्रोत हो उठा।

 

‘कुत्तों को बहुत डंडे मार लिए, अब मेरे साथ चलो और कर्मों को डंडे मारेंगे’

 

अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर महाराज के संयम और त्यागमय जीवन की शुरुआत भी गुरु के एक वाक्य से जुड़ी है।

 

बचपन में पप्पू नाम से पहचाने जाने वाले प्रसन्न सागर महाराज कुत्तों को डंडे मारा करते थे। तब आचार्य श्री पुष्पदंत सागर महाराज ने उनसे कहा था—“कुत्तों को बहुत डंडे मार लिए, अब मेरे साथ चलो और कर्मों को डंडे मारेंगे।”

 

गुरु का यही वाक्य उनके जीवन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ और आगे चलकर यही पप्पू अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर महाराज के रूप में तप, त्याग और साधना की मिसाल बने।

 

2019 में आचार्य पद से हुए विभूषित

 

उनकी कठोर तपस्या और साधना को देखते हुए वर्ष 2019 में आचार्य श्री पुष्पदंत सागर महाराज ने प्रसन्न सागर महाराज सहित अपने पांच शिष्यों को आचार्य पद से विभूषित किया और स्वयं गणाचार्य बने।

 

अन्तर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागर महाराज ने संस्कार पदयात्रा के माध्यम से देशभर में एक लाख किलोमीटर से अधिक की यात्रा भी की है।

 

557 दिन की अखंड मौन साधना ने रचा इतिहास

 

अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर महाराज की तप-साधना का सबसे उल्लेखनीय अध्याय सम्मेद शिखरजी की स्वर्णभद्र कूट की गुफा में की गई 557 दिन की अखंड मौन साधना है। इस कठिन साधना के दौरान उन्होंने उत्कृष्ट व्रत का पालन करते हुए केवल 61 दिन आहार एवं जल ग्रहण किया।

 

गुरु के सान्निध्य में शिष्य को स्वयं के आसन पर विराजित करने का यह संस्कार जैन परंपरा में गुरु-शिष्य संबंध की उस महान परंपरा को दर्शाता है, जिसमें गुरु अपने ज्ञान, तप, संस्कार और जिम्मेदारियों की विरासत शिष्य को सौंपता है।

 

पुष्पगिरी तीर्थ पर आयोजित यह पट्टाचार्य पद विभूषण महोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा, तप, त्याग, संस्कार और जिनशासन के प्रति समर्पण का ऐतिहासिक अवसर बन गया है।

 

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी

मोबाइल : 9929747312

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