निष्काम सेवा और संयम ही सच्चे धर्म का मार्ग: निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 योगसागर महाराज

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निष्काम सेवा और संयम ही सच्चे धर्म का मार्ग: निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 योगसागर महाराज

देई के नसियां जैन मंदिर में धर्मसभा, आत्मकल्याण, सेवा और सदाचार का दिया प्रेरक संदेश

देई।

देई स्थित नसियां जैन मंदिर में विराजमान निर्यापक श्रमण ज्येष्ठ मुनिश्री 108 योगसागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि निष्काम भाव से जीवन जीना ही सच्चा धर्म है। उन्होंने कहा कि अपने लिए तो हर व्यक्ति जीता है, किंतु जो दूसरों के सुख, सेवा और कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित करता है, वही वास्तविक अर्थों में धर्म का पालन करता है। मनुष्य को मोह-ममता और स्वार्थ का त्याग कर निस्वार्थ भाव से जीवन जीना चाहिए।

 

 

मुनिश्री ने कहा कि धैर्य, श्रद्धा और तप ही जीवन को सफल और सार्थक बनाते हैं। जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव के बीच भी संयम, विवेक और सकारात्मक सोच बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपने अवगुणों को त्यागकर सद्कर्मों की ओर अग्रसर होने तथा धर्म, सेवा और राष्ट्रहित के कार्यों में सक्रिय योगदान देने का आह्वान किया।

 

संतों का सान्निध्य बड़े पुण्यों से मिलता है: क्षुल्लक श्री संयम सागर महाराज

धर्मसभा में विराजमान क्षुल्लक 105 श्री संयम सागर महाराज ने कहा कि संतों का सान्निध्य अत्यंत दुर्लभ सौभाग्य है, जो अनंत पुण्यों के उदय से प्राप्त होता है। उन्होंने कहा कि भगवान के दर्शन प्रतिदिन संभव हैं, लेकिन सच्चे गुरु और संतों का सान्निध्य हर किसी को सहज उपलब्ध नहीं होता।

उन्होंने कहा कि संतों का विहार तीर्थंकर भगवान के विहार के समान कल्याणकारी होता है। संत समाज में धर्म, संयम, सदाचार और आत्मजागृति का प्रकाश फैलाते हैं तथा लोगों को आध्यात्मिक उन्नति की दिशा प्रदान करते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से गुरुजनों के प्रति अटूट श्रद्धा रखते हुए धर्म, संयम और सदाचार के मार्ग पर चलने का आह्वान किया।

संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी।9929747312 

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