तिरंगे की शान में गूंजा गुरुदेव सुनीलसागर महाराज का राष्ट्र संदेश, राजवाड़ा तक निकली भव्य तिरंगा यात्रा

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तिरंगे की शान में गूंजा गुरुदेव सुनीलसागर महाराज का राष्ट्र संदेश, राजवाड़ा तक निकली भव्य तिरंगा यात्रा

 

राजवाड़ा, इंदौर।

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर इंदौर में राष्ट्रभक्ति और अध्यात्म का अनूठा संगम देखने को मिला। आचार्य श्री 108 सुनीलसागरजी गुरुदेव ससंघ एवं हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में रामाशाह मंदिर से राजवाड़ा तक भव्य तिरंगा यात्रा निकाली गई। हाथों में तिरंगा और हृदय में राष्ट्रप्रेम का भाव लिए श्रद्धालु पूरे उत्साह के साथ यात्रा में शामिल हुए। यात्रा के दौरान वातावरण देशभक्ति के जयघोष से गूंज उठा।

 

राजवाड़ा पहुंचने पर ध्वजारोहण, राष्ट्रगान एवं मंगलाचरण के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर श्रद्धालुओं की ओर से आचार्य श्री को जिनवाणी भेंट की गई। इसके पश्चात आचार्य श्री सुनीलसागरजी महाराज ने मंगल प्रवचन के माध्यम से स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं देते हुए राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रधर्म, अहिंसा और सामाजिक जिम्मेदारी का संदेश दिया।

 

 

आजादी का यह ताज बड़े तप से भारत ने पाया है”

 

आचार्य श्री ने कहा कि स्वतंत्रता दिवस के इस पावन अवसर पर प्रकृति भी मानो हर्षित है और रिमझिम वर्षा के माध्यम से अपनी प्रसन्नता व्यक्त कर रही है। उन्होंने कहा, “आजादी का यह ताज बड़े तप से भारत ने पाया है, इसके लिए देश ने अनेक वीरों को खोया है।”

उन्होंने कहा कि आज हम स्वतंत्र देश की खुली हवा में सांस ले रहे हैं। यह स्वतंत्रता हमें सहज रूप से नहीं मिली, बल्कि इसके पीछे असंख्य वीरों का त्याग, तपस्या और बलिदान है। इसलिए स्वतंत्रता के महत्व को समझना और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।

 

भारत हमारा बड़ा घर और हमारा घर छोटा भारत”

 

आचार्य श्री ने राष्ट्र और परिवार के प्रति जिम्मेदारी को जोड़ते हुए कहा, “भारत हमारा बड़ा घर है और हमारा घर छोटा भारत है।” जिस प्रकार हम अपने घर की सुरक्षा, स्वच्छता, सम्मान और उन्नति के लिए प्रयास करते हैं, उसी भावना के साथ देश के लिए भी कार्य करना चाहिए।

 

उन्होंने युवाओं और नागरिकों से राष्ट्र के प्रति समर्पण, अनुशासन और जिम्मेदारी की भावना जागृत करने का आह्वान किया।

 

देश के लिए उतना ही जुनून चाहिए, जितना अपनी चीजों के लिए

 

आचार्य श्री ने प्रेरक उदाहरण देते हुए कहा कि यात्रा के दौरान छूटे हुए जूते को ढूंढने के लिए लोग जिस जुनून और तत्परता के साथ प्रयास करते हैं, यदि उतना ही जुनून देश के लिए दिखाया जाए तो भारत की तस्वीर बदल सकती है।

 

उन्होंने कहा कि राष्ट्र के प्रति प्रेम केवल नारों और उत्सव तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि वह हमारे व्यवहार, कार्य और जिम्मेदारियों में दिखाई देना चाहिए।

 

स्वतंत्रता संग्राम में जैन समाज के योगदान को किया याद

 

आचार्य श्री ने स्वतंत्रता संग्राम में जैन समाज के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि 100 से अधिक जैन समाज के वीरों ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में अपना बलिदान दिया। उन्होंने कहा कि देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले इन वीरों को स्मरण करना और उनके आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना हमारा दायित्व है।

 

उन्होंने इतिहास के अनसुने वीरों और वीरांगनाओं को भी याद करते हुए कहा कि रानी लक्ष्मीबाई से पहले दक्षिण भारत में भी ऐसी वीरांगनाएं हुईं, जिन्होंने विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध साहस और शौर्य का परिचय दिया। देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान देने वाले सभी ज्ञात-अज्ञात वीरों को नमन करना चाहिए।

 

“देश प्रेम की मिठास शब्दों में घोलिए, अब अंग्रेजी नहीं, हिंदी बोलिए”

 

राष्ट्रभाषा के प्रति जागरूकता का संदेश देते हुए आचार्य श्री ने कहा, “देश प्रेम की मिठास शब्दों में घोलिए, अब अंग्रेजी नहीं, हिंदी बोलिए।” उन्होंने हिंदी भाषा के प्रति सम्मान और दैनिक जीवन में अपनी भाषा के अधिकाधिक प्रयोग का संदेश दिया।

 

आचार्य श्री ने जैन समाज द्वारा देश को दिए गए अनेक युवाओं, राष्ट्रभक्तों और समाजसेवियों का उल्लेख करते हुए कहा कि जैन समाज ने सदैव राष्ट्र निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

 

‘भारत’ नाम की प्राचीन परंपरा का किया उल्लेख

 

आचार्य श्री ने भारत नाम की ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ‘भारत’ शब्द का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों और पुराणों में मिलता है। भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत से लेकर भगवान श्रीराम के भाई भरत तथा दुष्यंत-शकुंतला के पुत्र भरत तक, ‘भरत’ नाम भारतीय परंपरा में विशेष महत्व रखता है।

 

उन्होंने कहा कि भारत केवल भौगोलिक सीमा का नाम नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की संस्कृति, आध्यात्मिकता, त्याग और गौरव की पहचान है।

 

देश स्वतंत्र हुआ, अब विकारों से भी स्वतंत्र होना होगा

 

आचार्य श्री ने कहा कि देश तो स्वतंत्र हो गया, लेकिन अब प्रत्येक व्यक्ति को अपने भीतर के विकारों से स्वतंत्र होने की दिशा में प्रयास करना होगा। उन्होंने राग-द्वेष, क्रोध, लोभ और हिंसा जैसे विकारों से मुक्ति को वास्तविक स्वतंत्रता की दिशा बताया।

 

अहिंसा और जीवदया का संदेश देते हुए उन्होंने मांस के व्यापार को बंद करने तथा गौहत्या पर रोक लगाने की दिशा में समाज को जागरूक होने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रप्रेम के साथ जीवमात्र के प्रति करुणा और संवेदना भी भारतीय संस्कृति की पहचान है।

 

धर्म और राष्ट्रभक्ति का हुआ सुंदर संगम

 

इसके पश्चात दोपहर 1 बजे से श्री मनोकामना सिद्धि विधान एवं सर्वशांति महायज्ञ के प्रथम दिवस का आयोजन हुआ। इसमें हजारों श्रावक-श्राविकाओं ने जोड़े सहित सम्मिलित होकर धार्मिक अनुष्ठान का लाभ लिया।

 

संध्याकाल में गुरुमुख से शंका समाधान कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसमें श्रद्धालुओं ने अपनी जिज्ञासाएं रखीं और आचार्य श्री ने उनका समाधान किया। इसके पश्चात गुरुदेव की मंगलमय आरती के साथ दिनभर के कार्यक्रमों का समापन हुआ।

 

स्वतंत्रता दिवस पर आयोजित यह भव्य आयोजन राष्ट्रभक्ति, अध्यात्म, अहिंसा, हिंदी, जीवदया और सामाजिक उत्तरदायित्व का सुंदर संगम बनकर सामने आया। तिरंगे की शान में निकली यात्रा और गुरुदेव का राष्ट्र संदेश श्रद्धालुओं के लिए केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को याद करने का प्रेरणादायी अवसर बन गया।

 

माही जैन धीरावत, पीपलखूंट, प्रतापगढ़ से प्राप्त जानकारी।

संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी

मो.: 9929747312

 

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