इंदौर में मुनिश्री सुधासागर महाराज के सानिध्य में होगा भव्य रक्षाबंधन विधान, 700 मुनियों की रक्षा की जैन परंपरा को मिलेगा विराट स्वरूप

रक्षाबंधन आने वाला है। सामाजिक मान्यताओं के हिसाब से हम जन्म-जन्मांतर से इसे भाई-बहन के प्रेम का पर्व मानकर मनाते आए हैं, लेकिन जैन परंपरा इसकी तस्वीर कहीं अधिक विराट दिखाती है। और इस धार्मिक स्वरूप को जन-जन तक पहुँचाकर रक्षाबंधन को एक भव्य धार्मिक विधान और साधना के पर्व के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए हमें आभारी होना चाहिए निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी महाराज का।
जैन परंपरा में श्रावण शुक्ल पूर्णिमा का यह प्रसंग 700 मुनियों की रक्षा से जुड़ा है। आचार्य अकंपनाचार्य के मुनिसंघ पर बलि ने घोर उपसर्ग किया, तब विष्णु कुमार मुनि ने अपनी ऋद्धि के प्रभाव से उस उपसर्ग का अंत कर मुनिसंघ की रक्षा की। संकट टला तो श्रावकों ने मुनिराजों की सेवा की और धर्म तथा साधुओं की रक्षा का संकल्प लिया। यही वह भाव है जो रक्षाबंधन को केवल कलाई पर बंधने वाले धागे से उठाकर वात्सल्य, धर्मरक्षा और आत्मबल का पर्व बना देता है।
कथा में बताए गए इस पुण्यफल को धर्म से जोड़कर एक विशाल विधान का स्वरूप देने वाले प्रथम संत के रूप में निर्यापक मुनि श्री108 सुधासागर जी महाराज का नाम श्रद्धा से लिया जाता है। जिन-जिन नगरों में उनके चातुर्मास हुए हैं, वहाँ के श्रावक इस अनुभव को जानते हैं कि ऐसे धार्मिक आयोजनों से केवल उत्सव नहीं मिलता, बल्कि जीवन के संकटों से लड़ने का साहस और भीतर से उन्हें परास्त करने का आत्मबल भी मिलता है।
अब इंदौर के छत्रपति नगर, दलालबाग में चल रहे ऐतिहासिक चातुर्मास में फिर रक्षाबंधन के विशाल विधान की तैयारियाँ आकार ले रही हैं। कितना भव्य होगा, यह तो समय बताएगा; लेकिन इंदौर में अब तक जो हुआ है, उसने इतना जरूर साबित कर दिया है कि यहाँ होने वाला आयोजन सिर्फ देखा नहीं जाता, याद रखा जाता है।
निर्यापक श्रेष्ठ के सानिध्य में प्रतिदिन कोई न कोई आयोजन होता है और कभी आयोजन न भी हो, तो वातावरण ऐसा लगता है मानो धर्म का महोत्सव लगातार चल रहा हो। आयोजक भी पूरी ताकत से व्यवस्थाओं में जुटे हैं—आगंतुकों की सुविधा से लेकर हर छोटी-बड़ी आवश्यकता तक, सब कुछ चाक-चौबंद रखने का प्रयास जारी है।
और 15अगस्त का दिन भी कुछ ऐसा ही विशेष होने वाला है। क्योंकि जब देश की रक्षा और धर्म की रक्षा, दोनों को एक साथ देखने वाली दूरदर्शी दृष्टि हो, तो आयोजन केवल आयोजन नहीं रहता—वह एक ऐसा संदेश बन जाता है, जिसकी गूंज बहुत दूर तक जाती है।
इस बार रक्षाबंधन में कलाई पर सिर्फ रक्षा-सूत्र नहीं बंधेगा…
शायद हजारों हृदयों में धर्म की रक्षा का एक नया संकल्प भी बंधेगा।
श्रीश ललितपुर






