*जो अपना नहीं, उसे अपना मानना ही दुख का मूल कारण- सुनील सागरजी गुरुदेव
नेमीनगर जैन कॉलोनी, इंदौर।
जहाँ देह अपनी नहीं, वहाँ अपना कोई घर, संपत्ति और परिवार भी वास्तव में अपना नहीं है। जो हमारे साथ आया है, वह एक दिन बिछुड़ जाएगा और जो हमारा है, उसे हम चाहते नहीं जबकि जो हमें मिल सकता है, उसे पाने का प्रयास नहीं करते और जिसे पाने के लिए प्रयास करते हैं, वह हमेशा हमारे अनुसार प्राप्त नहीं होता। यही मोह और अपेक्षाएँ हमारे अनेक दुखों का कारण बनती हैं।
विचारों में परिवर्तन आ जाए तो दुखों के निवारण का मार्ग भी सहज हो सकता है। “जो मैं हूँ, सो बस मैं ही हूँ; जो मिले और बिछुड़ जाए, वह पर है।” धन, यौवन, शरीर और संसार की अन्य सभी वस्तुएँ नश्वर हैं, फिर भी जीव उन्हें अपना मानकर उनसे राग करता है और इसी मोह के कारण दुख पाता है।
एकत्व भावना हमें आत्मा के वास्तविक स्वरूप का स्मरण कराती है। आत्मा अकेली आई है और अकेली ही अपने कर्मों का फल भोगती है। इसलिए पर पदार्थों में ममत्व छोड़कर अपने शुद्ध आत्मस्वरूप की ओर लौटना ही सच्चे सुख की दिशा है।
इसी भाव के साथ जिनेन्द्र भगवान का स्मरण करते हुए यह समझना आवश्यक है कि संसार की नश्वर वस्तुओं में सुख खोजने के बजाय आत्मा में स्थित होना ही दुखों से मुक्ति का वास्तविक मार्ग है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
