मरण एक साथ हो सकता है, लेकिन कर्मों का हिसाब अलग-अलग होता है : आचार्य श्री सुनील सागरजी महाराज
‘दूसरों के कर्मों की चिंता छोड़ स्वयं के परिणाम सुधारें, हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा’ — आचार्य श्री
इंदौर।
नेमी नगर जैन कॉलोनी में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री 108 सुनील सागरजी महाराज ने जीवन, मृत्यु और कर्मों के गूढ़ सिद्धांत पर प्रकाश डालते हुए श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन और आत्मसुधार का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जीव संसार में अकेला आता है और अकेला ही जाता है, लेकिन उसके कर्म, कर्मों का बंध और उनके फल की व्यवस्था पूरी तरह व्यक्तिगत होती है।
आचार्य श्री ने कहा कि कई बार मनुष्य के मन में यह प्रश्न उठता है कि यदि जीव अकेला मरता है तो दुर्घटना अथवा किसी अन्य घटना में सैकड़ों लोगों की एक साथ मृत्यु कैसे हो जाती है? इसका उत्तर देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि बाहरी रूप से मृत्यु भले ही एक साथ दिखाई दे, लेकिन प्रत्येक जीव के कर्मों का हिसाब अलग-अलग होता है। किसी विशेष कर्म के उदय के कारण अनेक जीवों का एक ही समय में मरण संभव है, लेकिन उनके कर्म और कर्मफल की व्यवस्था प्रत्येक जीव के लिए व्यक्तिगत रहती है।
एक साथ मृत्यु, लेकिन कर्मों का हिसाब अलग
गुरुदेव ने उदाहरण देते हुए कहा कि एक साथ अनेक मच्छर भी मारे जा सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उन सभी के कर्म समान हैं। आस्रव, बंध और कर्मों के फल की पूरी व्यवस्था प्रत्येक जीव के अपने परिणामों के अनुसार होती है। इसलिए बाहरी घटना को देखकर कर्मों की समानता मान लेना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य अक्सर अपने सांसारिक राग-द्वेष, रिश्तों और मोह-ममता को अधिक महत्व देता है और धर्म तथा संतों की सेवा के बारे में बाद में सोचता है। लेकिन जब वही राग समाप्त हो जाता है तो भावनाओं का स्वरूप भी बदल जाता है। ऐसे में व्यक्ति को बाहरी संबंधों की अपेक्षा अपने आंतरिक परिणामों को सुधारने पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
एक डाली के फूल, लेकिन सबकी मंजिल अलग
आचार्य श्री ने फूल की सुंदर उपमा देते हुए कहा कि एक ही डाली पर खिले फूल अलग-अलग स्थानों पर उपयोग होते हैं। कोई फूल अर्थी पर चढ़ता है तो कोई भगवान के चरणों में अर्पित होता है। फूल एक ही डाली से टूटे, लेकिन उनका स्थान, उपयोग और उद्देश्य अलग-अलग रहा। ठीक इसी प्रकार संसार में साथ दिखाई देने वाले जीवों के कर्म और परिणाम भी अपने-अपने होते हैं।
‘हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा’
श्रद्धालुओं को प्रेरणा देते हुए आचार्य श्री ने कहा कि व्यक्ति को दूसरों की कमियों और कर्मों की वकालत करने के बजाय अपने भीतर सुधार लाने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने संदेश दिया—
“हम सुधरेंगे तो जग सुधरेगा; और जग सुधरे या न सुधरे, यदि हम सुधर गए तो हमारा कल्याण निश्चित है।”
आचार्य श्री ने कहा कि जीवन की वास्तविक दिशा बाहरी परिस्थितियों को बदलने में नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, परिणामों की शुद्धि और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने में है। मनुष्य यदि दूसरों के कर्मों की चिंता छोड़ अपने कर्म, आचरण और भावों को सुधारने लगे, तो यही आत्मकल्याण की सच्ची शुरुआत है।
माही जैन धीरावत, पीपलखूंट (प्रतापगढ़) से प्राप्त जानकारी।
संकलन : अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी





