त्याग से मिलता है आत्मकल्याण, इच्छाओं का अंत ही सच्चे संतोष का आरंभ : निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज

धर्म

त्याग से मिलता है आत्मकल्याण, इच्छाओं का अंत ही सच्चे संतोष का आरंभ : निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज

रत्नकरण्ड श्रावकाचार का दिव्य संदेश: ‘छोड़ोगे तभी पाओगे’, वैराग्य ही मोक्ष का वास्तविक मार्ग

कोटा, 6 अगस्त।

श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में परम पूज्य ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ससंघ के पावन चातुर्मास के अंतर्गत आयोजित धर्मसभा में त्याग, वैराग्य और आत्मकल्याण का अनुपम संदेश प्रवाहित हुआ। मुनिश्री ने कहा कि जीवन में सच्चा सुख पाने का मार्ग संग्रह नहीं, बल्कि त्याग है। जो छोड़ना सीखता है, वही शाश्वत आनंद और आत्मशांति को प्राप्त करता है।

 

 

 

मुख्य संयोजक चातुर्मास–2026 श्री हुकम जैन ‘काका’ ने बताया कि मुनिश्री की ओजस्वी एवं अमृतमयी वाणी का श्रवण करने के लिए प्रतिदिन कोटा सहित आसपास के अनेक क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पुण्योदय अतिशय क्षेत्र पहुँच रहे हैं। धर्मसभा में आत्मकल्याण, संयम और वैराग्य के संदेश से वातावरण भक्तिमय बना रहा।

आकांक्षाओं का अंत ही संतोष का आरंभ

रत्नकरण्ड श्रावकाचार के बारहवें श्लोक का भावार्थ स्पष्ट करते हुए मुनिश्री ने कहा कि सम्यग्दर्शन तभी जागृत होता है, जब साधक नश्वर संसार और कर्माधीन भोगों के आकर्षण से स्वयं को मुक्त कर लेता है।

उन्होंने कहा कि जब जीव को देव, शास्त्र और गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा प्राप्त हो जाती है, तब संसार की क्षणभंगुर वस्तुओं के प्रति उसका मोह स्वतः समाप्त होने लगता है। आत्मानुभूति और अंतरंग लक्ष्मी की प्राप्ति के बाद पाने के लिए कुछ भी शेष नहीं रहता। वास्तविक संतोष वहीं से प्रारंभ होता है, जहाँ इच्छाओं का अंत होता है।

‘छोड़ोगे तभी पाओगे’— जीवन का सनातन सत्य

अपने प्रेरक प्रवचन में मुनिश्री ने कहा कि लोभ, तृष्णा और अनियंत्रित इच्छाएँ मनुष्य के पतन का सबसे बड़ा कारण हैं। इतिहास इस बात का साक्षी है कि लोभ के कारण महान चक्रवर्ती भी अधोगति को प्राप्त हुए।

उन्होंने श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुए कहा—

“यदि जीवन में कुछ श्रेष्ठ पाना है, तो पहले कुछ छोड़ना सीखिए। छोड़ोगे तभी पाओगे।”

मुनिश्री ने कहा कि दान, त्याग और इच्छाओं का शमन आत्मा को निर्मल बनाता है। आकांक्षाएँ ऐसी अग्नि हैं जो कभी शांत नहीं होतीं। एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी जन्म ले लेती है। इसलिए इच्छाओं के पीछे नहीं, आत्मा के मार्ग पर चलना चाहिए।

भोग नहीं, वैराग्य ही मुक्ति का मार्ग

मुनिश्री ने कहा कि संसार के भोग अंततः रोग और अशांति का कारण बनते हैं। साधक को संसार में रहते हुए भी कमल के समान निर्लिप्त रहना चाहिए। जिस प्रकार कमल जल में रहकर भी उससे अछूता रहता है, उसी प्रकार मनुष्य को मोह, ममता और अहंकार से ऊपर उठकर जीवन जीना चाहिए।

उन्होंने कहा कि न स्वयं से प्रभावित होना है और न दूसरों को प्रभावित करने का अहंकार रखना है। परिस्थितियाँ बदलती रहेंगी, लेकिन साधक की आत्मिक शांति अटल रहनी चाहिए।

मुनिश्री ने भोगों की तुलना भुजंग (सर्प) से करते हुए कहा कि जैसे सर्प का विष जीवन के लिए घातक होता है, वैसे ही विषयासक्ति और भोग-विलास आत्मा की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा हैं। वैराग्य का उदय होते ही पाप और भोगों की आकांक्षा स्वतः समाप्त होने लगती है।

भक्ति और जिनवाणी से गुंजायमान रहा पुण्योदय अतिशय क्षेत्र

चातुर्मास प्रवचनमाला के दौरान मंदिर परिसर श्रद्धा, भक्ति और अध्यात्म के वातावरण से सराबोर रहा। श्रद्धालुओं ने पूजन, शांतिधारा, अर्घ्य समर्पण, जिनवाणी वंदना एवं विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागी होकर धर्मलाभ अर्जित किया।

धर्मसभा में श्री राकेश जैन (महामंत्री, श्री मुनिसुव्रतनाथ अतिशय क्षेत्र, केशोरायपाटन), श्री महेन्द्र गोधा (अध्यक्ष, खंडेलवाल समाज, दादाबाड़ी) एवं श्री सिद्धार्थ जैन (पूर्व अध्यक्ष, महावीर नगर विस्तार योजना) ने मुनिश्री के श्रीचरणों में श्रीफल अर्पित कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। तत्पश्चात चातुर्मास स्वागत समिति ने सभी अतिथियों का आत्मीय अभिनंदन किया।

आज के प्रमुख पुण्यार्जक

प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री राजेन्द्र जैन, श्री हुकम जैन ‘काका’, श्री प्रकाश हरसोरा परिवार, श्री महावीर मित्तल परिवार तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक ठोरा परिवार द्वारा प्राप्त किया गया।

श्री अशोक खादी ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्री रामरतन जैन-श्रीमती प्रेमवती जैन, डॉ. अक्षय जैन, डॉ. निधि जैन, प्रजस एवं जनित सहित समस्त बरमुंडा परिवार (घाट का बराना वाले), इंदिरा विहार तथा समस्त चिन्मय भक्त परिवार, कोटा द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री महावीर-श्रीमती भारती, श्रीमती नेहा जैन एवं श्री सिद्धार्थ मित्तल परिवार को प्राप्त हुआ।

उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी के आहारदान का सौभाग्य श्री हुकमचंद, श्री कपिल एवं श्री अमित सोगानी परिवार को प्राप्त हुआ। वहीं मंगलाचरण का पुण्य अवसर श्रीमती मोना माडिया एवं श्रीमती हर्षा कोटिया द्वारा सम्पन्न किया गया।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

🌼 गुरुवाणी के अमृत संदेश 🌼

  • त्याग ही आत्मकल्याण और शाश्वत सुख का वास्तविक मार्ग है।
  • आकांक्षाओं का अंत ही सच्चे संतोष और आत्मशांति का आरंभ है।
  • लोभ और तृष्णा मनुष्य के पतन का सबसे बड़ा कारण हैं।
  • भोग अंततः रोग का कारण बनते हैं, वैराग्य ही मोक्षमार्ग का आधार है।
  • देव, शास्त्र और गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा आत्मोन्नति की पहली सीढ़ी है।
  • दान, संयम, त्याग और आत्मचिंतन से ही जीवन सिद्धत्व की ओर अग्रसर होता है।

— संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *