ऐसी खामोशी से मेहनत करो कि सफलता स्वयं शोर मचाने लगे योगसागर महाराज
रहली
वीर शासन जयंती है, इसे हम शासनकाल मानते हैं, वर्तमान में तीर्थंकर का शासन काल आगे आने वाले तीर्थंकरों के जन्म लेने तक चलता है। तीर्थंकरों के हितोपदेश आज हमें शास्त्रों के माध्यम से मिल रहे हैं। पहले श्रुत ज्ञान होता था। आचार्य बोलते थे और शिष्य उसे कंठस्थ कर लेते थे। पर आज यह क्षमता कम हो गई है। आज से 1500 वर्ष पूर्व जो मुनि हुए हैं उन्हे
पूर्वाचारों कहा जाता है। उन्होंने ही शुद्ध ज्ञान को लिपिबद्ध कर हमें स्वाध्याय बना रहने के लिए परोपकार किया है। लोग घोर संसारी हो गए हैं। पहले एक छोटी सी घटना भी वैराग्य का कारण बन जाती थी, किसी को सिर में सफेद बाल दिख गया, किसी को आकाश में चमकती हुई बिजली दिख गई, नृत्य करते-करते नृत्यांगना की मृत्यु हो गई। जैसी घटनाएं वैराग्य कारण बन जाती थी। आज तो बड़ी-बड़ी घटनाएं सामने घट जाती हैं, स्वयं के शरीर पर विकृतियों दिखाई देने लगती है। तब भी वैराग्य का भाव नहीं आता।

यह उद्गार निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योग सागर महाराज ने कहे उन्होंने इष्टोपदेश की कक्षा को प्रारंभ करते हुए मंगलाचरण किया मंगलाचरण के विषय में बताते हुए उन्होंने कहा कि जिसके निमित्त से पाप का गलन हो उसे ही मंगलाचरण कहते हैं। प्रत्येक मंगल जीवन में पुण्य का अर्जन लाता है।

महाराज श्री ने कहा कि संसार में सब दुखी हैं, कोई तन से दुखी,कोई मन से दुखी ,कोई धन से दुखी है यदि जीवन में पुण्य का प्रभाव बना रहे तो दुख नहीं होता। किसी कारणवश दुख आता भी है तो उसे शमन करने की क्षमता आ जाती है। जीवन में थोड़ा सा दान पुण्य का कार्य किया ही नहीं की शोर मचाने लगते हैं यह दिखावा प्रदर्शन है। मैं कहता हूं कि ऐसी खामोशी से मेहनत करो कि सफलता स्वयं शोर मचाने लगे हम जो भी करते हैं वह स्वयं के लिए करते हैं, इसमें ना तो किसी का दोष है और ना किसी का एहसान है। हमें भगवान की भक्ति निस्वार्थ भाव से करना चाहिए तभी मुक्ति संभव है
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
