गुरुदेव सुधासागर महाराज आखिर यह शरीर है या संकल्प का हिमालय?
आज पूरे दिन मैं गुरुदेव को नहीं, तप की परिभाषा को चलता-फिरता देख रहा था। बार-बार मन में एक ही प्रश्न उठता रहा—आख़िर यह शरीर है या संकल्प का हिमालय?
गुरुदेव की आयु और उनका पुरुषार्थ… दोनों को एक तराजू में रखकर देखा, लेकिन तराजू बार-बार असंतुलित हो गया। जिस उम्र में सामान्य व्यक्ति अपने दिन का हिसाब दवाइयों, आराम और थकान से लगाता है, उसी उम्र में निर्यापक श्रेष्ठ पूज्य मुनि श्री 108 सुधासागर जी महाराज अपने दिन का हिसाब सामायिक, स्वाध्याय, अध्यापन, विहार, जिनवाणी, आहारचर्या, जिज्ञासा समाधान और हजारों भक्तों की भावनाओं से लगाते हैं।
सुबह साढ़े तीन बजे से शुरू हुई तप की यात्रा रात दस बजे तक बिना रुके चलती रही। घंटों सामायिक… फिर अध्यापन… सैकड़ों भक्तों का पादप्रक्षालन… फिर विहार… फिर जिनवाणी की अमृतवर्षा… आहारचर्या… भक्ति… प्रतिक्रमण… फिर सामायिक… फिर अध्यापन… फिर हजारों भक्तों को आशीर्वाद… संध्या भक्ति… जिज्ञासा समाधान… आरती… और अंत में वैयावृत्ति।
सबसे बड़ा आश्चर्य यह नहीं था कि गुरुदेव इतना सब कर रहे थे। सबसे बड़ा आश्चर्य यह था कि हर मिलने वाले को ऐसा अनुभव हो रहा था मानो गुरुदेव का पूरा समय उसी के लिए हो। न चेहरे पर थकान, न वाणी में कठोरता, न व्यवहार में अधीरता। इतनी सहजता… इतनी करुणा… इतना अपनापन—यही तो महापुरुषों की सबसे बड़ी पहचान है।
मैं तो आधा घंटा बैठ जाऊँ तो शरीर करवट माँगने लगता है, और गुरुदेव दस-बारह घंटे साधना में स्थिर रहते हैं, चार-पाँच किलोमीटर पदविहार करते हैं, फिर भी मुख पर वही तेज, वही प्रसन्नता और वही दिव्यता। तब मन ने कहा—यह शरीर से नहीं, आत्मबल से चलने वाला जीवन है।
आज समझ आया कि महासाधु बनने का कोई शॉर्टकट नहीं होता। इसके पीछे वर्षों का तप, त्याग, अनुशासन, संयम, आत्मबल और अनंत जीवों के कल्याण का संकल्प होता है। तभी तो हजारों लोग उनके दर्शन के लिए घंटों खड़े रहते हैं, क्योंकि वे केवल एक संत के दर्शन नहीं करते, बल्कि चलती-फिरती साधना, जागती हुई जिनवाणी और साकार तपस्या का दर्शन करते हैं।
ऐसे ही नहीं संसार उन्हें निर्यापक श्रेष्ठ कहता है। ऐसे ही नहीं उनके गुणों का गान देश-विदेश में होता है। ऐसे ही नहीं लाखों हृदय उनके चरणों में श्रद्धा से झुक जाते हैं।
सच तो यह है कि कुछ लोग उम्र जीते हैं, और कुछ महापुरुष हर दिन इतिहास रचते हैं। गुरुदेव उन्हीं विरले महापुरुषों में से एक हैं।
गुरुश्रेष्ठ की जय हो। उनके तप को बारंबार नमन। उनके चरणों में अनंत वंदन।
श्रीश ललितपुर



