सत्य की पहचान से खुलता है सम्यक दर्शन का द्वार, आत्मकल्याण का प्रथम कदम है सत्य’ की अनुभूति : स्वस्तिभूषण माताजी
तत्त्वार्थसूत्र के आठ सिद्धांतों की सरल व्याख्या कर श्रद्धालुओं को बताया सम्यक दर्शन का वास्तविक मार्ग
केशवरायपाटन।
श्रीमुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र में वर्षायोग के अंतर्गत आयोजित धर्मसभा में भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने सम्यक दर्शन के महत्व पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए कहा कि सत्य की पहचान ही सम्यक दर्शन की पहली सीढ़ी है। जिसने ‘सत’ को समझ लिया, उसने जीवन के वास्तविक स्वरूप को समझ लिया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए माताजी ने “सत, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अंतर, भाव एवं अल्पबहुत्व” की गूढ़ व्याख्या करते हुए बताया कि आचार्य उमास्वामी द्वारा रचित तत्त्वार्थसूत्र में सम्यक दर्शन की प्राप्ति के लिए वस्तु को जानने के आठ प्रमुख उपाय बताए गए हैं। इनमें सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण तत्व ‘सत’, अर्थात किसी वस्तु का वास्तविक अस्तित्व, है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार कोई व्यक्ति किसी वस्तु को खरीदने से पहले यह सुनिश्चित करता है कि वह वास्तव में उपलब्ध है या नहीं, उसी प्रकार आत्मतत्त्व को जानने के लिए सबसे पहले उसके अस्तित्व को स्वीकार करना आवश्यक है। जब मनुष्य वस्तु के वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है, तभी उसके भीतर सही श्रद्धा, सम्यक दृष्टि और आत्मकल्याण की भावना जागृत होती है।
धर्मसभा के दौरान उपस्थित श्रद्धालुओं ने माताजी के प्रेरक प्रवचनों का श्रवण कर आत्मचिंतन, आत्मजागरण और धर्म साधना का संकल्प लिया। पूरे वातावरण में धर्म, अध्यात्म और आत्मकल्याण की भावना का पावन संचार हुआ।
संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी।
मो.: 9929747312





