चातुर्मास तभी सफल होगा, जब जीवन में उतरेगा जैन दर्शन का आचरण : सुधासागर महाराज
इंदौर धर्मसभा में दिलाया शुद्ध भोजन का संकल्प, रात्रि भोजन, आलू-प्याज और व्यसनों के त्याग का दिया संदेश
इंदौर।
चातुर्मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित न रहकर जीवन में आत्मशुद्धि और संयम का माध्यम बने, तभी उसका वास्तविक उद्देश्य पूर्ण होता है। जैन दर्शन में प्रत्येक धार्मिक क्रिया भगवान को प्रसन्न करने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं की आत्मिक उन्नति और कल्याण के लिए की जाती है। इसलिए आहार-विहार, व्यवहार और विचार में जैन सिद्धांतों का पालन ही सच्चे अर्थों में चातुर्मास की सफलता है।
ये प्रेरक विचार निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 सुधासागर महाराज ने रविवार को इंदौर के दलाल बाग (वीआईपी रोड) स्थित विद्या-सुधा सत्संग मंडप में सकल दिगंबर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में आयोजित धर्मसभा में व्यक्त किए।
मुनिश्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को शुद्ध भोजन का संकल्प दिलाते हुए कहा कि जब तक नगर में साधु-संत विराजमान रहें, तब तक प्रत्येक जैन परिवार को अपने घर में पूर्णतः शुद्ध और सात्विक भोजन तैयार करना चाहिए। उन्होंने आह्वान किया कि इस अवधि में रात्रि भोजन, आलू, प्याज तथा गुटखा सहित सभी प्रकार के व्यसनों का पूर्ण त्याग करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जिस घर में साधु-संत आहार ग्रहण करें, उस परिवार को कम से कम छह माह तक इन वस्तुओं का त्याग बनाए रखना चाहिए। शुद्ध भोजन केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि मन, विचार और संस्कारों को भी पवित्र बनाता है। जब भोजन शुद्ध होगा, तभी हमारी सोच, व्यवहार और जीवन की दिशा भी शुद्ध होगी।
मुनिश्री ने कहा कि संयम, सादगी और आत्मानुशासन ही जैन धर्म की वास्तविक पहचान हैं। यदि चातुर्मास के दौरान इन सिद्धांतों को जीवन में अपनाया जाए, तो यह अवधि आत्मकल्याण, संस्कार निर्माण और आध्यात्मिक उन्नति का सशक्त माध्यम बन सकती है।
संकलन: अभिषेक जैन लुहाड़िया, रामगंजमंडी 9929747312



