मृत्यु सबसे बड़ा कष्ट, किसी भी जीव की हिंसा या प्राण लेना अनुचित” : आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी
केशवरायपाटन अतिशय क्षेत्र की धर्मसभा में आत्मा की अमरता, सम्यग्दर्शन और अहिंसा का दिया गहन संदेश
केशवरायपाटन।
अतिशय क्षेत्र में आयोजित धर्मसभा में भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने आत्मा की अमरता, अहिंसा और सम्यग्दर्शन पर आधारित प्रेरणादायी प्रवचन देते हुए कहा कि शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा कभी नष्ट नहीं होती। शरीर और आत्मा के अलग होने की अवस्था को ही मृत्यु कहा जाता है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने वास्तविक आत्मस्वरूप की पहचान कर जीवन जीना चाहिए।
आर्यिका माताजी ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से यह प्रश्न अवश्य करना चाहिए कि वह किस उद्देश्य से जीवन जी रहा है। अधिकांश लोग परिवार की जिम्मेदारियों, बच्चों के पालन-पोषण या मृत्यु के भय से जीवन व्यतीत करते हैं, जबकि जीव का वास्तविक स्वभाव ही जीना है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे अग्नि का स्वभाव उष्णता, जल का स्वभाव शीतलता और वायु का स्वभाव बहना है, उसी प्रकार आत्मा का स्वभाव भी जीवंत रहना है।
उन्होंने कहा कि मृत्यु संसार का सबसे बड़ा कष्ट है, इसलिए किसी भी जीव को पीड़ा देना, हिंसा करना या उसके प्राण लेना धर्म और मानवता—दोनों के विरुद्ध है। अहिंसा ही जीवन का सर्वोच्च मार्ग है और प्रत्येक व्यक्ति को सभी जीवों के प्रति करुणा एवं दया का भाव रखना चाहिए।
आर्यिका माताजी ने कहा कि आज मनुष्य अपनी पहचान आधार कार्ड जैसे दस्तावेजों से जोड़ता है, जबकि साधु-संत अपने आत्मस्वरूप को ही अपनी वास्तविक पहचान मानकर जीवन जीते हैं। यही आत्मबोध व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।
धर्मसभा में उन्होंने सम्यग्दर्शन की महत्ता बताते हुए कहा कि इसके दो आधार होते हैं—बाह्य और अभ्यंतर। बाह्य आधार त्रस नाड़ी है, जिसमें दो इन्द्रिय से लेकर पांच इन्द्रिय तक के जीव सम्मिलित हैं, जबकि अभ्यंतर आधार भव्य जीव है। सम्यग्दर्शन की प्राप्ति केवल भव्य जीव को ही होती है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर होने का प्रयास करना चाहिए।
संकलन : अभिषेक जैन 4लुहाड़िया, रामगंजमंडी। 9929747312

