“शुद्धि के बिना सिद्धि संभव नहीं, आराधना का उद्देश्य आत्मविशुद्धि है” — राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज*

धर्म

*”शुद्धि के बिना सिद्धि संभव नहीं, आराधना का उद्देश्य आत्मविशुद्धि है” — राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज*

मधुबन

गुणायतन में आयोजित श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के सातवें दिवस पंच परमेष्ठी की आराधना के अवसर पर राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि भगवान की भक्ति का वास्तविक उद्देश्य भौतिक उपलब्धियाँ प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मा की आंतरिक शुद्धि है। उन्होंने कहा कि जैसे पूर्णिमा का चंद्रमा अमावस्या के अंधकार को दूर कर देता है, उसी प्रकार प्रभु की आराधना मन के अज्ञान और अशुद्धि को समाप्त कर आत्मप्रकाश का मार्ग प्रशस्त करती है।

 

 

मुनिश्री ने कहा कि श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान की संपूर्ण साधना नौ तत्वों तथा पंच परमेष्ठी की आराधना पर आधारित है। यदि जीवन में शुद्धि आ जाती है तो सिद्धि का मार्ग स्वतः खुल जाता है। इसलिए प्रत्येक साधक का प्रथम लक्ष्य अपने भावों की विशुद्धि होना चाहिए। उन्होंने कहा कि पंच परमेष्ठी की आराधना का वास्तविक फल तभी प्राप्त होता है, जब साधक अपने भीतर आत्मविशुद्धि का भाव जागृत करे।

 

 

उन्होंने श्रद्धालुओं से 29 जुलाई को आयोजित चातुर्मास कलश स्थापना महोत्सव में अधिकाधिक संख्या में सहभागिता करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि चातुर्मास केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि मुनि संघ की साधना, आराधना और धर्मप्रभावना से स्वयं को जोड़ने का श्रेष्ठ अवसर है। श्रद्धालु धर्म रत्न, श्रद्धा रत्न, भक्ति रत्न, श्रावक रत्न, सौभाग्य रत्न एवं पुण्य रत्न जैसी विभिन्न सहभागिताओं के माध्यम से अपनी श्रद्धानुसार धर्मकार्य में योगदान देकर पुण्य अर्जित कर सकते हैं।

 

 

राष्ट्रसंत ने विशेष रूप से युवाओं की सहभागिता पर बल देते हुए कहा कि दशलक्षण पर्व के दस दिन आत्मपरिष्कार, संस्कार और आध्यात्मिक उन्नति का अनुपम अवसर प्रदान करते हैं। उन्होंने परिवारों से आग्रह किया कि वे नई पीढ़ी को धर्म से जोड़ें तथा पुत्र-पुत्रवधू एवं युवाओं को धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागी बनने के लिए प्रेरित करें, जिससे धर्म-संस्कार उनके जीवन का स्थायी आधार बन सकें।

 

 

उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को यह विचार करना चाहिए कि धर्मकार्य में उसकी क्या भूमिका और क्या योगदान हो सकता है। यही भावना जीवन को सार्थक बनाती है और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।

इस अवसर पर मुनि श्री संधान सागर महाराज एवं मुनि श्री सार सागर महाराज ने मंत्रोच्चारण के साथ विधान सम्पन्न कराया। मंच पर मुनि श्री समादर सागर महाराज, मुनि श्री रूप सागर महाराज सहित मुनि संघ विराजमान रहा।

 

 

गुणायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं मुख्य जनसंपर्क अधिकारी वीरेंद्र जैन छाबडा ने बताया कि कार्यक्रम का संचालन विधानाचार्य बाल ब्रह्मचारी अशोक भैया एवं अभय भैया ने किया। विधान के सातवें दिवस पंच परमेष्ठी—अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय एवं समस्त निर्ग्रन्थ साधुओं—की आराधना करते हुए 512 अर्घ समर्पित किए गए।

 

 

उन्होंने बताया कि विधान के आठवें दिवस 28 जुलाई को भगवान के 1008 नामों का स्मरण करते हुए 1024 अर्घ समर्पित किए जाएंगे। 29 जुलाई को प्रातः 5 बजे मंगलाष्टक के साथ 55 मिनट की वृहद् शांतिधारा सम्पन्न होगी तथा मुनि श्री संधान सागर महाराज का 12वाँ दीक्षा दिवस श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा। दोपहर 1:30 बजे गुणायतन के नवीन परिसर में चातुर्मास कलश स्थापना-2026 का मुख्य समारोह आयोजित होगा।

 

गुणायतन एवं श्री सेवायतन से जुड़े सभी पदाधिकारियों ने श्रद्धालुओं से चातुर्मास कलश स्थापना महोत्सव एवं आगामी धार्मिक आयोजनों में सपरिवार उपस्थित होकर धर्मलाभ लेने की अपील की है।

— अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’

राष्ट्रीय प्रवक्ता, गुणायतन से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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